वर्ष 2008 हमेशा एक 'काले साल' के रूप में जाना जाएगा। इस वर्ष ने आतंक के स्याह साए को दुनिया पर गहराते देखा है तो एक अश्वेत व्यक्ति को महाशक्ति अमेरिका का शक्तिमान होते देखा है।
जर्जर हो चुके इराक में एक महाशक्ति के राष्ट्रपति की विदाई भी काले जूते फेंककर दी गई तो आर्थिक मंदी ने भी अपनी काली परछाई से हर आम और खास को डराया। वैसे भी ज्योतिष के आधार पर देखें तो 'आठ नंबर' शनि का माना जाता है और उसका रंग भी काला होता है।
अमेरिका में एक अश्वेत और मुस्लिम पिता की संतान बराक ओबामा का राष्ट्रपति चुना जाना तथा विश्व की अर्थव्यवस्था पर आर्थिक मंदी की मार ऐसी घटनाएँ है, जिसने पूरी दुनिया को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रभावित किया है। ये दोनों घटनाएँ हमारी वर्तमान और आने वाली पीढ़ियों पर अमिट छाप छोड़ेंगी।
मंदी की मार : शेयर मार्केट पर आधारित अमेरिका की अर्थव्यवस्था अपने देशवासियों को कर्ज देते-देते धराशायी हो गई और लेहमैन ब्रदर्स और मैरिल लिंच के दिवालिया घोषित होने से शुरू हुए वैश्विक आर्थिक संकट ने यूरोप होते हुए जापान के रास्ते एशिया में प्रवेश किया और इसके लपेटे में टाइगर इकॉनोमी कहे जाने वाले जापान, चीन, दक्षिण कोरिया भी आ गए हैं।
स्वर्णिम ऊँचाई छू रहा भारतीय शेयर बाजार भी एकाएक 20000 से 7000 अंकों पर आ गिरा और आर्थिक मंदी का भय चहुँओर फैल गया। हालाँकि भारतीय सरकार द्वारा समय रहते कदम उठाने से स्थिति उतनी नहीं बिगड़ी जितना कि अंदेशा था, पर मंदी से जूझ रही जनता पर महँगाई की दोतरफा मार पड़ी।
तेल का खेल : इस साल अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम बढ़कर रिकॉर्ड 149 डॉलर प्रति बैरल हो गए, जो वर्ष के अंत में 34 डॉलर से भी नीचे आ गए। जून में देश में पेट्रोल-डीजल के दामों में बढ़ोतरी हुई। मुद्रास्फीति बढ़कर 11 प्रतिशत हो गई और इसका असर रोजमर्रा की वस्तुओं पर आया और खाद्य पदार्थ महँगे हो गए।
आम आदमी की रसोई पर इस मार के कारण भी मंदी का हौव्वा लोगों के सिर चढ़कर बोला। हालाँकि साल खत्म होते-होते पेट्रोल के दाम भी कम हुए और महँगाई दर 6.84 प्रतिशत तक नीचे आ चुकी है, लेकिन इसका प्रभाव अभी आम आदमी को कहीं दिखाई नहीं दे रहा है।
भारत को आया करार : कड़े विरोध के बावजूद अन्तत: भारत-अमेरिका परमाणु करार को हरी झंडी मिल ही गई। हालाँकि अमेरिकी 'हाइड एक्ट' को लेकर भारतीय पक्ष की आशंकाएँ अब भी अपनी जगह कायम हैं।
आतंकवाद का नया चेहरा : आतंक से जूझ रहे भारत के लिए एक साध्वी और सेना के अधिकारी का बम विस्फोट में संदिग्ध पाया जाना भी एक चौंकाने वाली घटना रही। इस्लामिक आतंकवाद के जवाब में हिन्दू आतंकवाद का मुद्दा बड़े जोर-शोर से उछाला गया। लगभग हर समाचार-पत्र तथा टेलीविजन चैनल पर इसका शोर मचा रहा, जो 26/11 के बाद दब गया। |