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मौलिक अधिकार और कानून का इंसाफ
अफसोस की बात यह है कि अब तक कोई कानून बना नहीं है और सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए निर्देश ही कानून का काम कर रहे हैं। संविधान के अनुच्छेद 141 के अनुसार सुप्रीम कोर्ट द्वारा घोषित कानून भारत की सभी अदालतों एवं प्राधिकारियों पर बंधनकारक होगा। सार्वजनिक विधान के क्षेत्र में अधिकारिता के नियमों के उदारीकरण से जनहित याचिकाओं के विकास का मार्ग प्रशस्त हुआ है। इन याचिकाओं में अदालतों की भूमिका की तीखी आलोचना भी हुई है। आरोप यह है कि न्यायपालिका सरकार चला रही है और उसने देश के प्रशासन को अपने हाथों में ले लिया है।
आलोचक इस बात को भूल जाते हैं कि जनहित याचिकाओं के अधिकांश मामलों में अदालतें सरकार को विधायिका द्वारा बनाए गए कानून लागू करने के ही आदेश दे रही हैं।

यह सच है कि जनहित याचिकाओं की सुनवाई करते हुए अदालतों ने कुछ ऐसे भी आदेश व निर्देश जारी किए हैं, जो न्यायिक कार्यक्षेत्र से बाहर थे और दिमाग से ज्यादा दिल को भाने वाले थे। इसमें शक है कि क्या न्यायपालिका प्रशासन को यह निर्देश दे सकती है कि वह सड़क व इमारतें बनाए, अमुक क्षेत्र में अमुक लोगों के आवास के लिए भूमि अधिगृहीत करे, कोर्ट द्वारा तय पारिश्रमिक पर प्रबंधकों की नियुक्ति करे या फिर अदालत बड़ी-बड़ी राशियाँ अदा करने के तदर्थ निर्देश दे। ऐसे आदेशों के गंभीर वित्तीय एवं बजट संबंधी परिणाम होते हैं और ये विधायिका तथा कार्यपालिका के क्षेत्राधिकार में आते हैं।
इसमें शक नहीं कि जनहित याचिकाओं का दुरुपयोग हुआ है और कुछ मामलों में तो ये 'प्रचार हित याचिका', 'व्यक्तिगत हित याचिका', 'राजनीतिक हित याचिका' और यहाँ तक कि 'धन हित याचिका' बदल गई हैं। इस मामले में न्यायमूर्ति श्री पसायत ने सावधान करते हुए कहा है-'जब यह मानने के लिए पर्याप्त आधार हो कि जनहित याचिका की आड़ में व्यक्तिगत दुश्मनी निकाली जा रही है, तो ऐसी याचिका को खारिज कर दिया जाना चाहिए...यदि इसका ठीक तरह विनियमन न किया गया और इसके दुरुपयोग को रोका न गया तो यह गलत लोगों के हाथों में बदला लेने का हथियार बन सकता है। याचिका का वास्तव में जनहित से संबंध होना चाहिए...।'

इस बात को अक्सर भुला दिया जाता है कि जनहित याचिकाएँ हर मर्ज की रामबाण दवा नहीं हैं। जनहित से जुड़ा प्रत्येक मसला जनहित याचिका का आधार नहीं हो सकता, जैसे प्याज के दामों में वृद्धि, हवाई यात्रा के भाड़े में परिवर्तन, रेलवे स्टेशनों की खस्ता हालत या फिर ट्रेनों का समय पर न चलना। अदालतों ने जनहित याचिकाओं के दुरुपयोग की कड़ी निंदा की है तथा कई बार ऐसी याचिकाएँ दायर करने वालों पर दंडात्मक कार्रवाई भी की है।

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जनहित याचिकाओं के चलते लंबे समय से जेल में पड़े विचाराधीन कैदियों को मुक्ति मिली है, गुलामी का जीवन गुजार रहे लोगों को आजाद कर उनका पुनर्वास किया जा सका है, संरक्षण गृहों एवं मनोचिकित्सालयों में रहने वाले लोगों के साथ मानवोचित व्यवहार किया जाने लगा है, पत्थर की खदानों व ईंट भट्टों पर काम करने वाले लोगों तथा खतरनाक पेशों में लगे छोटे बच्चों की स्थिति में सकारात्मक परिवर्तन आया है। पर्यावरण से जुड़े मामलों में न्यायिक सक्रियता के चलते खतरनाक टेक्नोलॉजी के उपयोगमें जवाबदेहिता सुनिश्चित की जा सकी है और इसके अच्छे परिणाम भी मिले हैं। कम से कम कुछ निर्धन, वंचित, शोषित लोगों के लिए मौलिक अधिकार वास्तविकता बन गए हैं।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अदालतों ने मानवीय पीड़ा को गंभीरता से लेना शुरू किया है और इसके प्रति संवेदनशील रवैया अपनाया है। यह कोई कम बड़ी उपलब्धि नहीं है। दृढ़ न्यायाधीश तथा जिम्मेदार वकील यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि जनहित याचिकाएँ बेलगाम घोड़ान बन जाएँ बल्कि लोगों के मानवाधिकारों की रक्षा व संवर्द्धन के लिए इस्तेमाल की जाएँ।
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