मुख पृष्ठ > विविध > वेबदुनिया विशेष 08 > गणतंत्र दिवस > हमारी सभ्यता का आईना हैं हमारे शहर
सुझाव/प्रतिक्रियामित्र को भेजिएयह पेज प्रिंट करें
 
हमारी सभ्यता का आईना हैं हमारे शहर
शहरों के पर्यावरण में भी तेजी से बिगाड़ आया है। विश्व बैंक के एक अध्ययन में पाया गया है कि भारतीय शहरों की प्रदूषित वायु के कारण प्रति वर्ष 40000 व्यक्ति असामयिक मृत्यु को प्राप्त हो रहे हैं। जल प्रदूषण की स्थिति इस बात से समझी जा सकती है कि हमारी नदियाँ सालमें अधिकांश समय विशाल नालों के समान दिखती हैं। ध्वनि प्रदूषण भी शहरों में जीवन-स्तर को खराब कर रहा है। राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला के एक सर्वेक्षण के मुताबिक दिल्ली, मुंबई और कोलकाता विश्व के सर्वाधिक शोर-शराबे वाले शहर हैं।

कम ही भारतीय शहर उच्च श्रेणी के शहरी अनुशासन को बनाए रखने के लिए जाने जाते हैं। लेकिन हाल ही में तो व्यवस्थित नागरिक जीवन के सिद्धांतों की खुल्लम-खुल्ला धज्जियाँ उड़ाई गई हैं। अतिक्रमण और अवैध निर्माण बड़े पैमाने पर हो रहे हैं। भूमि व निर्माण माफिया उठ खड़े हुए हैं। शहरी अपराध पहले से अधिक परिष्कृत और चालाकीपूर्ण हो गए हैं। नगर निकायों में भ्रष्टाचार कई गुना बढ़ गया है। शहरों के प्रशासन के लिए सुसंगत, समन्वित तथा जीवंत व्यवस्था की दरकार होती है मगर हमारे शहरों के पास हैं विखंडित, विभंजित और जड़बुद्धि प्राधिकारी, जो किसी भी समस्या से दो-दो हाथ करने में अक्षम हैं।

मध्यप्रदेश में केवल 44 प्रतिशत शहरी घरों को पेयजल, बिजली और सफाई व्यवस्था की सुविधा उपलब्ध है। पन्ना, रीवा और सतना जैसे छोटे शहरों में तो मात्र 30 प्रतिशत घरों में ही ये सुविधाएँ उपलब्ध हैं। भोपाल, इंदौर, ग्वालियर तथा जबलपुर तेजी से मुख्य शहरी केंद्रों तथा अपने-अपने क्षेत्रों के विकास केंद्रों के रूप में विकसित हो रहे हैं। समय की माँग है कि राज्य के सभी शहरों का विस्तार से नियोजन किया जाए और उनके मास्टर प्लान को कड़ाई से लागू किया जाए। जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीकरण मिशन के तहत केंद्र से मिलने वाली वित्तीय सहायता का भी कुशलतापूर्वक दोहन किया जाना चाहिए।

आज भारतीय शहरों के समक्ष विकट समस्याएँ खड़ी हैं। इनका प्रभावी तरीके से सामना किया जा सकता है बशर्ते हमारा राष्ट्र स्वस्थ सांस्कृतिक एवं सभ्यतागत संस्कार प्राप्त करे। अंततः राष्ट्र की अंतःप्रेरणा ही तय करती है कि उसके शहर पतन को प्राप्त होंगे या उत्थान को

दर कोई बुलबुला नहीं है। यह कायम रहेगी। यह मानने के पर्याप्त कारण हैं कि आज हम उद्योग के मोर्चे पर जो आधार खड़ा कर चुके हैं, वह टिकाऊ और दीर्घावधि वाला है। हमें संरक्षणवाद के युग से हटकर प्रतिस्पर्धा के युग में प्रवेश करना होगाः देश के भीतर ही नहीं, विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धा के युग में। यदि ये परिवर्तन आ जाएँ, तो भारत विश्व और उसकी अर्थव्यवस्था में अपना अर्थपूर्ण योगदान दे सकेगा।
<< 1 | 2 | 3 
और भी
नागरिक होने का अर्थ
भारत में मानव अधिकार
इस गणतंत्र में कहाँ हैं बच्चे?
22 बहादुर बच्‍चे...
रघुरमन! तुम्‍हें शत् शत् नमन्
गणतंत्र या परतंत्र?