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इस गणतंत्र में कहाँ हैं बच्चे?
कल्पना कीजिए कि यदि 85 फीसदी बच्चे भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा अर्जित कर सकें तो हमारे देश को जल्द ही एक महाशक्ति बनने से कौन रोक सकता है। जरूरत है एक जबर्दस्त राजनीतिक इच्छाशक्ति की। जरूरत है लाखों की भीड़ जुटाने वाले हमारे धर्मगुरुओं, संत-महात्माओं में बचपन के प्रति सम्मान और संवेदना की। और जरूरत है हम और आप जैसे लोगों में एक बुनियादी नैतिकता की। जो कहने को तो बच्चों को ईश्वर का रूप और देश का भविष्य बतलाती है, किंतु व्यवहार ठीक इससे उल्टा होता है। इतनीही बड़ी जरूरत है बाल अधिकारों के प्रति सभी प्रचार माध्यमों खासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जागरूकता फैलाने की। साथ ही विभिन्ना विभागों और मंत्रालयों के बीच तालमेल बनाकर एक बाल कल्याण विकास नीति, अर्थनीति और राजनीति की, जिसमें देश के बच्चे सर्वोच्च प्राथमिकता पर हों

देश के विकास के लिए जरूरी बच्चों का विकास
भारत में बच्चों की जनसंख्या पूरे विश्व में सर्वाधिक है। दसवीं पंचवर्षीय योजना (2002-07) में एक रेखांकित पंक्ति के साथ यह बताने की कोशिश की गई है कि भारत का भविष्य भारतीय बच्चों के भविष्य में निहित है। यह पंक्ति कुछ इस प्रकार है-'देश के विकास कार्यक्रम मेंबच्चों का विकास पहली प्राथमिकता है। केवल इसलिए नहीं कि वे सर्वाधिक संवेदनशील हैं, बल्कि इसलिए भी क्योंकि वे देश की सबसे बड़ी पूँजी हैं और साथ ही भविष्य का मानव संसाधन हैं

2001 की जनगणना के मुताबिक भारत में करीब 157.86 मिलियन बच्चे (6 वर्ष से कम उम्र के) हैं, जो पूरी जनसंख्या का करीब 15.42 प्रश है। इस जनसंख्या में से करीब साढ़े 7 करोड़ बालिकाएँ और करीब 8 करोड़ बालक हैं। इस तरह से इनका लिंग अनुपात 927/1000 है। इस जनसंख्या का एक निश्चित अनुपात ऐसे आर्थिक और सामाजिक वातावरण में रहता है, जिससे कि इनका शारीरिक व मानसिक विकास बाधित होता है। इसी स्थिति से गरीबी, बीमारी आदि बढ़ते हैं।

भारत सरकार ने अगस्त 1974 में बच्चों के लिए राष्ट्रीय नीति की घोषणा की थी। 2 अक्टूबर 1975 को शुरू हुई एकीकृत बाल विकास योजना में बच्चों के विकास के लिए अनेक कार्यक्रम निर्धारित किए थे, परंतु क्या इन सरकारी दावों व योजनाओं ने देश में बच्चों की दशाको पूरी तरह सँवार लिया है। इसका चिंतन कुछ इस तरह से किया जा सकता है।

भविष्य का बच्चा बनाम बच्चों का भविष्य
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में बच्चों के लेकर कुछ अनुमानित आँकड़े भविष्य में बच्चों की स्थिति को लेकर आशंकित करते हैं। यदि अन आँकड़ों का हवाला लें तो देश में बच्चों की स्थित अच्छी नहीं कही जा सकती।
* एक अनुमान के मुताबिक देश में करीब 10 करोड़ बच्चे किसी न किसी तरह बालश्रम में लगे हैं।
* प्रति 3 में से 2 बच्चों ने किसी न किसी तरह की प्रताड़ना को झेला है।
* बच्चों में लिंग अनुपात 1000 बालकों पर 927 बालिकाएँ हैं।
* 16 में से एक बच्चा एक साल की उम्र पूरा करने से पहले मर जाता है।
* केवल 43 प्रतिशत बच्चों का जन्म अच्छे स्वास्थ्य विशेषज्ञ की देखरेख में हो पाता है।
* 30 प्रतिशत नवजात बच्चे सामान्य वजन से भी कम के होते हैं।
* भारत के मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अनुसार 2003 तक 6-14 वर्ष की आयुवर्ग के करीब 1 करोड़ बच्चे स्कूल ही नहीं पहुँचे हैं। यह संख्या 2001 में 3.54 करोड़ थी, लेकिन अन्य गैर-सरकारी सूत्र इस संख्या को 4.8 करोड़ बताते हैं।
* स्कूल में पहुँचने वाले प्रति 10 बच्चों में से 4 प्राथमिक स्तर पर पढ़ाई छोड़ देते हैं। इसी तरह प्रति 10 बच्चों में से 7 माध्यमिक स्तर पर पढ़ाई छोड़ देते हैं।

ऊपर बताए गए इन घोषित और अनुमानित आँकड़ों के आधार पर यदि 2050 में बच्चों के भविष्य को तय करने या उस स्थिति की कल्पना करने की कोशिश करें तो परिस्थितियाँ कुछ इस तरह तरह होंगी-

देश की करीब आधी जनसंख्या निरक्षर, कुपोषित, प्रताड़ित और बेरोजगार होगी। आश्चर्य में डालने वाला तथ्य यह है कि जिस जनसंख्या की यहाँ बात हो रही, वह पुरुषों की होगी, क्योंकि बालकों के प्रति पूर्वाग्रह रखने वाले इस समाज में बालक, बालिक अनुपात और भी अधिकअसंतुलित हो जाएगा। यदि इस समस्या को सुलझाने के लिए क्रांतिकारी कदम अभी भी नहीं उठाए गए तो वर्तमान भारतीय अर्थव्यवस्था दीर्घकालिक नहीं रह सकती।
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