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शफीक़ माँ है !  
- अहमद कलीम फैज़पुरी
SubratoND

मिरी निगाह
इतनी मोतबर कहाँ थी ?
कि देखता मैं
तुझको तेरे अदँर
चेहरगी का वो आईना भी
कि शफ्फाक सा रहा है
अज़ल से अब तक ।

वो इक तक़द्दुस
कि लम्स जिसका
उँगलियों की
हर एक पोर में निहाँ था
गुमाँ को मेरे
आवाज़ दे रहा था।

मैं अपने अँदर नहीं था कुछ भी
कहाँ था मैं
इसकी ख़बर नहीं थी।

जगाया मुझको फिर सूरजों ने
दरीचें दिल के जो वा हुए हैं
तो मैंने जाना
कि तू मिरी शफीक़ माँ है !
और भी
पत्र माँ के नाम
तेरे आँगन में...
बेसन की सोंधी रोटी
आप स्मृतियों में बसी रहेंगी
बस एक माँ है जो ख़फ़ा नहीं होती
इस खुशी से वंचित न करो