- ज्योति जैन मेरी अपनी कोई जात न थी, कोई रिश्ता था न नाता था, जिससे भी पहला नाता था, वो मेरी जननी माँ का था।
जिसने मुझको है जन्म दिया, पाला पोसा और बड़ा किया, कुछ ज्ञान दिया, विज्ञान दिया, इस जीवन को अध्यात्म दिया।
जिससे लाभान्वित हो मैंने, नैतिकता का अभ्यास किया, जीवन को ढाल लिया उस पर, कुछ कष्ट सहा बर्दाश्त किया।
निर्भय भी हुई, संतोष मिला, जीवन जीने का मार्ग मिला परिवार को जो कुछ दे पाई, वो थी तेरी निर्मल माया।
एहसान है जो जीवन ये दिया, दे पीयूष हलाहल खुद ही पिया, तेरी ममता की धारा ने, मुझ तिनके को अस्तित्व दिया।
है ईश्वर से यही प्रार्थना यही, लूँ जन्म मैं अगली बार कभी, उस भव में भी माँ तू ही मिले, है मेरी मनीषा बस इतनी।
|