भारत ने आजादी मिलने के बाद जिस तरह शिक्षा, तकनीकी, उद्योग, अंतरिक्ष आदि क्षेत्रों में प्रगति के नए सोपान स्थापित किए हैं, उसी तर्ज पर खेल के मैदान पर भी भारतीय खिलाड़ियों ने पूरी दुनिया में अपनी श्रेष्ठता साबित की है। भारत की इस खेल यात्रा का अतीत बेहद गौरवशाली रहा है और इसी अतीत से प्रेरणा लेकर वर्तमान ने खुद को सजाया-सँवारा है।
बेशक 1947 के बाद पहली बार 2008 के बीजिंग ओलिम्पिक खेलों में भारतीय हॉकी नजर नहीं आई, लेकिन उससे पहले के सालों में भारतीय खिलाड़ियों ने शानदार प्रदर्शन किया है। आजादी मिलने के बाद पूरे देश में जोश-जज्बा था। पहली बार भारतीय हॉकी टीम ने स्वतंत्र देश के रूप में 1948 के लंदन ओलिम्पिक में शिरकत की। आज की पीढ़ी यह जानकर ताज्जुब करेगी कि इस टीम का नेतृत्व इंदौर के समीप महू के किशनलाल ने किया था।
जिन अंग्रेजों ने भारत को गुलाम बनाकर रखा था, उसी अंग्रेज टीम को उसकी ही धरती पर भारत ने हराकर स्वर्ण पदक हासिल किया था। हॉकी की यह ओलिम्पिक स्वर्णिम सफलता 1952 (हेलसिंकी) और 1956 (हेलसिंकी) तक कायम रही। 1960 रोम ओलिम्पिक में भारत ने काँस्य पदक जीता, जबकि 1964 के टोकियो ओलिम्पिक में पुन: स्वर्ण पदक अर्जित किया।
1975 में भारत विश्व कप हॉकी के फाइनल में पाकिस्तान को 2-1 से हराकर विश्व विजेता बना। 1980 के मास्को ओलिम्पिक के स्वर्ण पदक के बाद भारतीय हॉकी रसातल में जाती रही।
शतरंज दिमागी कसरत का सबसे बेहतरीन साधन है और इस खेल का जन्मदाता भारत हमेशा पिछड़ा हुआ था। रूसी शतरंज खिलाड़ी गैरी कास्परोव और अनातोली कारपोव के किले में किसी युवा शतरंज खिलाड़ी ने सेंध लगाई तो वह खिलाड़ी विश्वनाथन आनंद के सिवाय दूसरा और कोई नहीं था।
तीन बार विश्व चैम्पियन बनने वाले विश्वनाथन आनंद आज भी शतरंज की बिसात पर भारत के लिए नए मुकाम हासिल करने में जुटे हैं। विश्वनाथन की सफलता ने भारत के कई युवा खिलाड़ियों को प्रेरित किया और कोनेरू हम्पी, हरिकृष्णा, परिमार्जन नेगी जैसी प्रतिभाएँ सामने आईं।
बिलियर्ड्स-स्नूकर में माइकल फरेरा पहली बार विश्व चैम्पियन बने और फिर तो भारत के विश्व चैम्पियनों की कतार लग गई। गीत सेठी, यासिन मर्चेन्ट ने भारत का नाम रोशन किया। पुरुष बैडमिंटन में भारत ने दो सितारे दिए। प्रकाश पादुकोण और पुलेला गोपीचंद ने ऑल इंग्लैंड के खिताब जीते और भारत का नाम बैडमिंटन के आकाश पर चमकाया।
फुटबॉल में भारत की दो उल्लेखनीय सफलता अंतरराष्ट्रीय नेहरू स्वर्ण कप फुटबॉल के साथ-साथ एफसी कप में विजेता बनने की रही और दोनों ही प्रसंगों पर भारतीय टीम की कप्तानी बाइचुंग भूटिया जैसे सितारे ने की।
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