वर्ष 1947 में आजादी मिलने के बाद देश ने लोकतांत्रिक व्यवस्था को अपनाया और भारत को एक लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने की शुरुआत की गई थी। स्वतंत्रता के 61 वर्ष बाद ऐसा लगता है कि देश ने लोकतांत्रिक मूल्यों को आत्मसात करने के साथ-साथ कुछेक ऐसी प्रवृत्तियों को भी जन्म दिया है जो कि देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए बहुत बड़ा खतरा साबित हो रही हैं।
देश के लगभग हर हिस्से में अलोकतांत्रिक व्यवहार और हिंसा का बोलबाला है। मजबूत लोकतांत्रिक विशेषताओं के साथ हमारी सफलता पर हम गर्व कर सकते हैं, लेकिन इसके साथ विरोधाभास यह भी है कि इस व्यवस्था के चलते देश में अलगाववादी प्रवृत्तियाँ बढ़ी हैं और देश के सामने विभाजन के खतरे दिन-ब-दिन बढ़ते जा रहे हैं।
लोकतंत्र देश में मजबूत हो रहा है, लेकिन इसके साथ ही असमानता, अशिक्षा, गरीबी, मुखमरी और हिंसा भी बढ़ रही है। आर्थिक और सामाजिक ढ़ाँचा चरमराने लगा है और लोकतांत्रिक व्यवस्था में अनिश्चितताएँ बढ़ रही हैं।
हमने स्वतंत्रता के बाद इमरजेंसी जैसा लोकतांत्रिक संकट देखा तो मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू किए जाने जैसा सामाजिक चेतना का विस्तार भी। देश में दो बार परमाणु परीक्षण किए गए तो बाबरी मस्जिद का विध्वंस और उसके बाद देश भर में फैली हिंसा ने भी हमें यह सोचने पर विवश किया कि क्या साम्प्रदायिकता के आधार पर देश के विभाजन के बाद भी हमने इससे कोई सबक लिया?
गुजरात में साम्प्रदायिक हिंसा को जो दंश देश झेल चुका है वह अभी भी इस रफ्तार से बढ़ रहा है कि राजनीतिज्ञों के उकसावे के कारण जम्मू-कश्मीर जैसा सीमावर्ती राज्य भी दो अलग-अलग हिस्सों में बँट चुका है।
सेना के बल पर हम इसे एक बनाए रखने में सक्षम हैं लेकिन घाटी के मु्स्लिमों का मुजफ्फराबाद की ओर कूच करना यह बताने के लिए पर्याप्त है कि अलगाववाद इस हद तक बढ़ चुका है कि देश के विभाजन के लिए पाकिस्तान की आईएसआई जैसी बदनाम एजेंसी को कोई खास कोशिश करने की जरूरत नहीं है क्योंकि देश बाँटने के लिए हमारे अपने राजनीतिज्ञ ही काफी हैं।
घाटी में अमरनाथ श्राइन बोर्ड को जमीन देने और फिर वापस लेने को लेकर समूचे देश में बंद होता है लेकिन घाटी से लाखों कश्मीरी पंडित पलायन करते हैं तो इस पर कोई बंद नहीं होता और न ही संसद, राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कोई आवाज उठाई जाती है? क्योंकि देश के सभी छोटे बड़े राजनीतिक अपनी सुविधा, तुष्टिकरण और वोटों की राजनीति से उपर उठ ही नहीं पाते हैं।
देश ने 2002 में गुजरात में भयंकर साम्प्रदायिक हिंसा और मुस्लिम समुदाय के सदस्यों की ह्त्याओं का दौर देखा, लेकिन अल्पसंख्यकों के खिलाफ होने वाले अपराधों पर कोई लगाम नहीं लगी? यही बात राजनीतिक, जाति और आर्थिक कारणों से लगातार बढ़ती हिंसा पर भी लागू होती है। इनके रोकथाम का कोई उपाय भी नजर नहीं आता और कोई ऐसा सेफ्टी वाल्व भी नहीं दिखता जोकि इन प्रवृ्त्तियों पर कारगार तरीके से नियंत्रण कर सके।
वैसे मोटे तौर स्वतंत्रता के बाद भारत में जो प्रमुख प्रवृत्तियाँ देखी जा सकती हैं वे हैं भारत में तेजी से बढ़ती साम्प्रदायिकता। हिंदुत्व के नाम पर बढ़ रही ताकतें चुनावों तक ही सीमित नहीं हैं वरन् ये देश के सामाजिक और आर्थिक जीवन में भी बाधाएँ खड़ी कर रही हैं।
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