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दोस्त और दोस्ती के अशआर
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* कौन क़ातिल बचा है शहर में फ़ैज़
जिससे यारों ने रस्म-ओ-राह न की ।

* कर रहा था ग़म-ए-जहाँ का हिसाब
आज तुम याद बेहिसाब आए

* आप की जिस में हो मरज़ी वो मुसीबत बेहतर
आपकी जिसमें ख़ुशी हो वो मलाल अच्छा है।

*वो ज़माना भी तुम्हें याद है तुम कहते थे
दोस्त दुनिया में नहीं दाग़ से बेहतर अपना

* जो शख़्स मुद्दतों मेरे शैदाइयों में था
आफ़त के वक़्त वो भी तमाशाइयों में था

* तबीयत अपनी घबराती है जब सुनसान रातों में
तो ऎसे में तेरी यादों की चादर तान लेते हैं

* रोज़ आया न करो उसने कहा था राशिद
आज सड़कों पे भटक लूँ वहाँ कल जाऊंगा।

* निगाह-ए-यार का क्या है, हुई हुई न हुई
ये दिल का दर्द है प्यारे, गया गया न गया।

* दिन में जो हँस-हँस के मिलता है अज़ीज़
रात में उठ-उठ के वो रोता है दोस्त

* हमारी चाहतें सच हैं मगर हालात का दरिया
मुझे इस पार रखता है तुम्हें उस पार रखता है

* बे यार रोज़-ए-ईद शब-ए-ग़म से कम नहीं
जाम-ए-शराब दीदा-ए-पुरनम से कम नहीं

* न हुआ पर न हुआ मीर का अंदाज़ नसीब
ज़ौक़ यारों ने बहुत ज़ोर ग़ज़ल में मारा ।

* हम मोहब्बत में भी तोहीद के क़ाइल हैं फ़राज़
एक ही शख़्स को महबूब बनाए रखना ।

* दोस्ती उसकी निभ नहीं सकती
दिल न माने तो आज़मा देखो

* बात कम कीजे, ज़हानत को छुपाए रहिए
अजनबी शहर है ये दोस्त बनाए रहिए

* दुश्मनी लाख सही ख़त्म न कीजे रिश्ता
दिल मिले या न मिले हाथ मिलाए रहिए

* दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे
जब कभी हम दोस्त बन जाएँ तो शर्मिन्दा न हों

* मैं ख़ुदा का नाम लेकर पी रहा हूँ दोस्तो
ज़हर भी इसमें अगर होगा दवा बन जाएगा
संकलन- अजीज अंसार
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