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जब स्त्रियों ने उठाई बंदूकें
जब गोरों के छाती को छील गई गोलियाँ:
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शांति घोष और सुनीति चौधरी दो साहसी बालिकाएँ थीं, जो कम उम्र में ही क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल हो गई थीं। इतिहास में 18 अप्रैल, 1930 को चटगाँव के शस्‍त्रागार पर पड़े छापे का जिक्र मिलता है। उस छापे का नेतृत्‍व यही दोनों बालिकाएँ कर रही थीं। उस समय वह नौवीं कक्षा की छात्रा थीं। स्‍कूल के बाद दोनों एक क्रांतिकारी संगठन के लिए काम करती थीं। इस संगठन का उद्देश्‍य देश को गुलामी से आजाद कराना था।

पढ़ाई के दौरान ही उन्‍होंने तलवारबाजी और बंदूक चलाने का प्रशिक्षण लिया था। क्रांतिकारी संगठन ने एक अँग्रेज जिलाधिकारी स्‍टीवेंस को उड़ाने की योजना बनाई और इसकी जिम्‍मेदारी सौंपी सुनीति और शांति को। सुबह-सुबह जब स्‍टीवेंस सैर के लिए अपने घर से बाहर निकला दो गोलियाँ दनादन उसकी छाती को भेदती आरपार हो गईं। इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता, स्‍टीवेंस ढेर हो चुका था। उसके सामने साहस से मुस्‍कुराती हाथों में पिस्‍तौल थामे सुनीति और शांति खड़ी थीं

इस हत्‍या के खिलाफ गोरी अदालत में मुकदमा चला। अँग्रेजों की रूह काँप उठी। यह कैसा देश है, जहाँ नन्‍ही-नन्‍ही लड़कियों में भी बंदूक उठाने और खुद अपने सीने पर गोली खाने का जज्‍बा है। स्‍टीवेंस की हत्‍या के आरोप में दोनों को उम्र कैद की सजा मिली। पूरे मुकदमे के दौरान जिस हिम्‍मत और गौरव से मस्‍तक उठाए दोनों खड़ी थीं, उसने पूरे देश का माथा गर्व से ऊँचा कर दिया


महान क्रांतिकारी लीला नाग:
हिंदुस्‍तान की क्रांतिकारी महिलाओं में एक और नाम बहुत शिद्दत के साथ याद किया जाता है, लीला नाग का। लीला ढाका के मुक्ति संघ क
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साथ काम करती थीं। उन्‍होंने महिलाओं के लिए दीपाली स्‍कूल और नारी शिक्षा मंदिर आदि नामों से स्‍कूल खोले। ऊपर से यह सामान्‍य विद्यालय नजर आते, पर वास्‍तव में इनका काम स्त्रियों के बीच क्रांतिकारी विचारों और गतिविधियों का प्रसार करना था। लीला नाग और उनके पति अनिल राय ने मिलकर ढाका के पुलिस महानिरीक्षक लोमैन की हत्‍या की योजना बनाई थी

बंगाल के घर-घर में सुनी एक कहानी :
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ऐसी ही एक और क्रांतिकारी महिला थी, बीना, जो बंगाल के अत्‍यंत संभ्रांत परिवार से आती थी। देश की तमाम वीरांगनाओं की तरह कउम्र में हिंदुस्‍तान की आजादी से उन्‍होंने विवाह कर लिया और अब यही उनके जीवन का मकसद था। 6 फरवरी, 1932, बंगाल का एक गोरा गवर्नर किसी कॉलेज के दीक्षांत समारोह में आने वाला था। क्रांतिकारियों ने उसे खत्‍म करने की योजना बनाई और इसका दायित्‍व सौंपा गया, बीना को। गवर्नर जैसे ही भाषण देने के लिए खड़ा हुआ, भीड़ के बीच से दो हाथ आगे बढ़े और दनादन गोली दागी गई। हाथ कच्‍चे थे, निशाना चूक गया। फिरंगी अदालत ने लीला नाग को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। बंगाल के घर-घर में आज भी बीना के किस्‍से सुनाए जाते हैं

ऐसे और भी बहुत से नाम है, जो इतिहास के पन्‍नों पर दर्ज नहीं हो पाए, पर जो हिंदुस्‍तान की तारीख में अहम स्‍थान रखते हैं। गोरों कलिखे इतिहास में इनका जिक्र नहीं मिलता, क्‍योंकि खुद उनकी आत्‍माएँ वीरता के ऐसे प्रदर्शन से काँप उठी थीं। पर कुछ बातें होती हैं, जो पन्‍नों पर दर्ज न भी हों तो भी उन्‍हें मिटाया नहीं जा सकता। इन वीरांगनाओं की कथा भी कुछ ऐसी ही है।
 
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