मगर इस पूरे मामले को नया स्वरूप तब मिला जब 2 मार्च, 2006 को अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश और भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने असैन्य परमाणु सहयोग समझौते पर अपने हस्ताक्षर किए। इस समझौते के प्रमुख बिंदु कुछ इस प्रकार रहे- •सैन्य उद्देश्य से जुड़े भारत के परमाणु कार्यक्रम में अड़चन नहीं डालेगा या हस्तक्षेप नहीं करेगा।
•अमेरिका भारत केन्द्रित परमाणु ईंधन आपूर्ति समझौता के लिए आईएईए के साथ वार्ता करने में अमेरिका भारत की मदद करेगा।
•अमेरिका परमाणु ईंधन की आपूर्ति में भावी अड़चन या व्यवधान से निबटने के लिए भारत को परमाणु ईंधन का सामरिक जखीरा विकसित करने में मदद करेगा।
•परमाणु ईंधन की आपूर्ति में कोई अड़चन आने पर परमाणु ईंधन की आपूर्ति बहाल करने के उपाय करने के लिए अमेरिका और भारत संयुक्त रूप से आपूर्तिकर्ता मित्र देशों के समूह की बैठक का आह्वान करेंगे, जिसमें रूस, फ्रांस और ब्रिटेन जैसे देश शामिल हैं।
•दोनों देशों ने संबंधित उद्योगों और उपभोक्ताओं के हितों के अनुरूप आपस में परमाणु कारोबार को बढ़ावा देने पर सहमति जताई।
•भारत और अमेरिका ने परमाणु पदार्थ, गैर परमाणु पदार्थ उपकरण और अवयव के हस्तांतरण पर सहमति जताई। करार के अंतर्गत हस्तांतरित कोई भी विखंडनीय पदार्थ निम्न संवर्धित यूरेनियम होगा।
•निम्न संवर्धित यूरेनियम को परमाणु संयंत्र प्रयोगों में और रूपांतरण या फैब्रिकेशन के लिए ईंधन के रूप में उपयोग के उद्देश्य से हस्तांतरित किया जा सकता है।
•करार के दायरे में परमाणु संयंत्रों से जुड़े प्रयोगों और अनुसंधान विकास, डिजाइन, निर्माण, संचालन, देखरेख और संयंत्र का संचालन बंद करना शामिल है। अमेरिका के पास परमाणु ईंधन और प्रौद्योगिकी वापस लेने का अधिकार है, लेकिन उसे इस तरह की वापसी से आने वाली लागत की भरपाई करनी होगी।
भले ही अभी इस समझौते के कई बिंदु ऐसे हैं, जिनके संदर्भ में कई मतभेद हैं और समझौते पर अभी काफी स्पष्टीकरण बाकी है, पर विदेशी महाशक्तियों के भारत के साथ इस तरह के समझौते को निःसंदेह एशियाई समूह में भारत की बढ़ती साख का एक प्रतीक ही मानना चाहिए, जिसने विश्व की ताकतवर शक्तियों को एक बार फिर से सोचने पर मजबूर कर दिया है।
आज हम पलटकर अपने अतीत में झाँके तो अपने आप को तीसरी दुनिया से निकलकर अव्वल दर्जे के देशों की नजरों में सम्माननीय रूप में ही पाएँगे।
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