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जब्‍तशुदा नज्‍में
( ये गीत आजादी की लड़ाई के दौरान आजादी के उन परवानों के द्वारा लिखे गए थे, जिन्‍हें आज कोई नहीं जानता। ब्रिटिश हुकूमत के समय में ये गीत सरकार ने जब्‍त कर लिए थे और इन्‍हें लिखने वालों को अँग्रेज सरकार के उत्‍पीड़नों का शिकार होना पड़ा था। ये गीत आज भी हमें उस जज्‍बे की याद दिलाते हैं, जो उनके दिलों में सुलग रही थी और जिसने आजादी की शमा को रौशन रखा।)

देशभगत का प्रलाप

- कम

हमारा हक है हमारी दौलत़ किसी के बाबा का जर नहीं है,
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है मुल्क भारत वतन हमारा, किसी की खाला का घर नहीं है

ये आत्मा तो अजर-अमर है निसार तन-मन स्वदेश पर ह
है चीज क्या जेल, गन, मशीनें, कजा का भी हमको डर नहीं है।

न देश का जिनमें प्रेम होवे, दु:खी के दु:ख से जो दिल न रोए,
खुशामदी बन के शान खोए वो खर है हरगिज बशर नहीं है।

हुकूक अपने ही चाहते हैं न कुछ किसी का बिगाड़ते हैं,
तुझे तो ऐ खुदगरज ! किसी की भलाई मद्देनजर नहीं है

हमारी नस-नस का खून तूने बड़ी सफाई के साथ चूसा,
है कौन-सी तेरी पालिसी वो कि जिसमें घोला जहर नहीं है

बहाया तूने हैं ख़ूँ उसी का, है तेरी रग-रग में अन्न जिसका,
बता दे बेदर्द तू ही हक से, सितम यह है या कहर नहीं है

जो बेगुनाहों को सताता, कभी न वो सुख से बैठ पाता,
बड़े-बड़े मिट गए सितमगर, तुझे क्या इसकी खबर नहीं है।
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