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गाँधीजी को श्रद्धांजलि
महान परंपरा के वारिस
मैं आश्‍वस्‍त हूँ कि गाँधीजी के महान बलिदान हमारे देश के लोगों की अन्‍त:रात्‍मा को जागृत करेगा और प्रत्‍येक भारतीय के दिल में अत्‍यधिक जिम्‍मेदारी का आहृवाहन करेगा। मैं आशा और प्रार्थना करता हूँ कि गाँधीजी के मिशन को पूरा कर पाएँ

इस पवित्र मौके पर, हममें से कोई भी अपने हृदय को उल्‍लासित करने की क्षमता नहीं रखते। आओ सब एक साथ मिलकर खड़े हों और हिम्‍मत से इस देश को हुई क्षति का सामना करें, जो हमें जकड़े हुए है। आओ सभी बुद्धिजन वचन दें कि हमलोग गाँधीजी की शिक्षा और आदर्शों को हमेशा जीवित रखेंगे।
महात्‍मा गाँधी ने अपने झुके हुए कंधों पर मानवता के कर्त्‍तव्‍यों का जिम्‍मा उठाया और अब उनके लिए खड़ें हों और उसे आपस में बाँटें। यदि करोड़ों भारतीय उस कर्तव्‍य को बराबर बाँट लें और सफलतापूर्वक उसका निर्वहन करें, यह किसी करिश्‍मे से कम नहीं होगा।


अपने झुके हुए कंधों पर मानवता जिम्‍मा उठाय
- मौलाना अबुल कलाम अजा

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महात्‍मा गाँधी ने अपने झुके हुए कंधों पर मानवता के कर्त्‍तव्‍यों का जिम्‍मा उठाया और अब उनके लिए खड़ें हों और उसे आपस में बाँटें। यदि करोड़ों भारतीय उस कर्तव्‍य को बराबर बाँट लें और सफलतापूर्वक उसका निर्वहन करें, यह किसी करिश्‍मे से कम नहीं होगा




देश को उसकी स्‍वतंत्रता और उसका तिरंगा दिय
- श्रीमती सरोजनी नायड

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महात्‍मा गाँधी, जिनके मृत शरीर ने कल अग्नि से यह वादा किया कि वह मृत नहीं होंगे। यह सच था दाह संस्‍कार का कार्यक्रम मरे हुए राजाओं के बीच हुआ जिन्‍हें दिल्‍ली में भुला दिया गया है, लेकिन वह राजाओं के राजा थे। यह भी सच है कि ये वो थे जो शांति के वाहक थे उनका दाह संस्‍कार योद्धा की तरह पूरे सम्‍मान के साथ किया जाना चाहिए। उन योद्धाओं से कहीं बेहतर, जिन्‍होंने सेना की अगुवाई इस छोटे कद-काठी के व्‍यक्ति के लिए की, सबसे बहादुर, सबका सबसे सच्‍चा मित्र। दिल्‍ली फिर से महान क्रांति का केंद्र और शरण स्‍थल बन गया है, जिन्‍होंने देश को विदेशी दासता से मुक्‍त कराया और उसे उसकी स्‍वतंत्रता और उसका तिरंगा दिलाया

हिन्‍दू समुदाय के विमोच
- डॉ राजेंद्र प्रसा

क्‍या हम कभी ऐसा सोच सकते हैं कि गाँधीजी हिंदुओं या अपने धर्म के लिए कोई संकट ला सकते हैं? क्‍या यह संभव था कि हिन्‍दू समुदाय का यह विमोचक और गरीबों और असहायों का मुक्तिदाता कभी भी ऐसा करने की सोच भी सकता है?
क्‍या हम कभी ऐसा सोच सकते हैं कि गाँधीजी हिंदुओं या अपने धर्म के लिए कोई संकट ला सकते हैं? क्‍या यह संभव था कि हिन्‍दू समुदाय का यह विमोचक और गरीबों और असहायों का मुक्तिदाता कभी भी ऐसा करने की सोच भी सकता है? लेकिन संकीर्ण विचार वाले और संकुचित सोच वाले, जो हिन्‍दू धर्म के मर्म को नहीं समझ पाए हैं वो इस प्रकार सोचते हैं और वर्तमान परिस्थिति का सीधा परिणाम इस प्रकार की सोच है




अतीत को भुलाने का एकमात्र प्रती
- डॉ एस. राधाकृष्‍ण्‍

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गाँधीजी पर अचानक हुए इस हमले से मैं स्‍तब्‍ध हूँ कहने के लिए मेरे पास शब्‍द नहीं हैं। यह अविश्‍वसनीय, अकथनीय घटना हुई है। हमारे युग के उस सहृदय, सबसे उन्‍नत, सबसे प्रेरणादायक व्‍यक्ति का एक व्‍यक्ति के गुस्‍से का शिकार होना यह दर्शाता है कि हम अभी भी सुकरात, जिन्‍होंने जहर पी लिया था, जीसस को सूली पर चढ़ा दिया गया था उस दौर से अब तक विकसित नहीं हो पाए हैं। महात्‍मा गाँधी, अतीत को भुलाने वाले एकमात्र प्रतीक अब नहीं रहे। हमने उन्‍हें मार दिया लेकिन उनके अंदर मौजूद सत्‍य और प्‍यार की लौ को कभी बुझा नहीं पाएँगे

कब विश्‍व संतों के लिए सुर‍क्षित हो पाएगा ? क्‍या प्रभुत्‍व, क्‍या पूरा विश्‍व, शिक्षा ले पाएगा कि यदि हम हिंसा के रसा‍तल में, दुष्‍टता और कोलाहल में नहीं गिरना चाहते, इसके अलावा और कोई रास्‍ता नहीं है, जिसके लिए गाँधीजी जिए और मरे



हमें उनके बताए रास्‍तों का पालन जरूर करना चाहिए
- जयप्रकाश नाराय

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यह समय बोलने का नहीं है यह शोक का अवसर है। आओ विलाप करें। देश विलाप करे और उनकी आत्‍मा से उसे पोछें उस महानतम व्‍यक्ति के निर्दोष खून को जो अब तक विश्‍व में पहली बार बना है। हमें महात्‍मा गाँधी के दिखाए रास्‍ते पर जरूर चलना चाहिए।

वो किसी खास मिशन के लिए दिल्‍ली आए थे, ‘करो या मरो‘ उन्‍होंने बहुत कुछ किया और अंत में उन्‍होंने अपने कर्तव्‍यों के लिए अपने जीवन की कुर्बानी दी। आओ अब उनके द्वारा अधूरे छोड़े हुए पुनीत कर्तव्‍यों को पूरा करें।
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