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मोहब्बत का पेड़
प्रिया आनं

आह... जिंदगी

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नीले सागर के तट पर खड़ी सुप्रिया समझ नहीं पा रही थी कि वह यहाँ क्यों खड़ी थी। लहरें बारी-बारी उसके पैरों को छूकर वापस चली जाती थीं। अचानक एक तेज लहर आई और ढेर सारी बूँदें छिटके हुए पारे की तरह तट के रेत पर फैल गईं। व रेत पर आकर भी सूखी नहीं थीं, बल्कि सात रंगों की आभा लिए झिलमिल कर रही थीं। उसने उन्हें छूने को हाथ बढ़ाया, तभी किसी ने उसका हाथ थाम लिया।

उसने पलटकर देखा और उसके चेहरे का रंग सिंदूरी हो गया। वही था एकदम सीधी नजर से उसे देखता हुआ। उन आँखों में गहरा प्यार था और चेहरे पर उतनी ही गहरी आत्मीयता। यह साँवला-सलोना चेहरा और उसकी जादुई मुस्कान हमेशा ही उसे इसी तरह बाँध लेती थी। उसे अपने चेहरे पर उसकी साँसों की तपिश का अहसास हुआ और तड़पकर उसने आँखें खोल दीं। उसका चेहरा पसीने से तरबतर था। खिड़की के परदे हवा से काँप रहे थे और बाहर भोर के हलके उजास में उड़ते परिंदों की खुशनुमा आवाजें थीं।

यह कैसा सपना था वह आज तक नहीं समझ पाई थी। इसी तरह वह कहीं न कहीं उसे मिल ही जाता था। किसी मंदिर में, समंदर के किनारे या फिर किसी खूबसूरत-सी वादी में। सुप्रिया उस चेहरे, उसकी हँसी और उसके माथे की एक-एक लकीर से परिचित थी। उसके हाथों की छुअन और उसके जादुई आवाज के वह इतनी करीब थी कि वह अगर धुँधलके में भी दिखता था तो वह पहचान जाती थी। पर एक बात वह कभी नहीं समझ पाई कि उसके हर सपने की कड़ी दूसरे सपने से कैसे जुड़ जाती थी।

कैप्टन विक्रम आनंद जब घाघरा नदी के किनारे बसे उस छोटे-से गाँव तक पहुँचा तो यह देखकर हैरान हो गया कि उसके वहाँ पहुँचने से पहले ही उसके मित्र अविनाश ने पूरा इंतजाम कर रखा था। रेस्ट हाउस में अटैची रख वह बाहर निकल आया। अब उसके सामने दूर तक फैला नदी का विस्तार था और पानी की सतह को छूते हलके कपासी बादलों के पहाड़। सूरज की रोशनी नदी की लहरों पर झिलमिला रही थी। इस बेहतरीन खूबसूरती से मंत्रमुग्ध होकर रह गया विक्रम। उसे संतोष-सा था कि जिस एकांत की तलाश में वह यहाँ तक आया था, उससे भी खूबसूरत एकांत उसे हासिल हो गया था।

हवा में हलकी खुनकी थी और नदी के प्रवाह का शोर धीमा। पूर्व की तरफ से दो छोटी-छोटी पालदार नावें चली आ रही थीं। कितनी देर तक वह यों ही खोया-सा देखता रहा। अचानक ही उस सन्नाटे में घोड़े की टापों की आवाज गूँजी। वह चौंक गया। उसने पलटकर देखा, नदी जहाँ से यू टर्न लेती थी, उसी के साथ गुजरती पतली-सी सड़क पर एक घुड़सवार लड़की आ रही थी। घोड़े की अलमस्त चाल से उसके कंधों तक के बाल हवा में लहरा रहे थे। डूबते सूरज की लाली उसके चेहरे को रोशन किए थी।

विक्रम एकबारगी हतप्रभ रह गया। वह उसके सामने क्षण भर के लिए रुकी। एक उड़ती हुई निगाह उस पर डाली और आगे बढ़ गई। नीली कार्डराय और ऑफ व्हाइट सिल्क की शर्ट में वह बेहद खूबसूरत लग रही थी। विक्रम के होंठों पर हल्की सी हँसी दौड़ गई। यह गाँव उसे किसी बड़े कैनवास की तरह ही लग रहा था, जिसमें छोटी सी छोटी चीज भी अपना अलग महत्व रखती थी और बाकायदा अपने होने का ऐलान करती थी।

अविनाश सुबह ही उसे लेने आ गया था। गाँव के बिल्कुल बीच में उसका बड़ा-सा घर था। सामने सुंदर खुला हुआ लॉन और बाउंड्री वॉल से लगे सफेद के दो पेड़। वे दोनों चाय पी रहे थे, जब वह पूजा की थाली लिए सामने से आती दिखाई दी।

उसने हलका फिरोजी सूट पहन रखा था। माथे पर रोली की बिंदी और थाली में जलते दीपक की रोशनी में चमकती पनीली आँखें।
विक्रम, यह मेरी बहन सुप्रिया है।
अविनाश ने कहा।
पर यह तो नदी किनारे घोड़े पर, वह रुक गया।
अविनाश खिलखिलाकर हँस पड़ा।

  ठीक है। कहकर विक्रम खामोश हो गया। उस रात एक बार फिर विक्रम की सोच सुप्रिया की ओर मुड़ गई। एकबारगी उससे पहली मुलाकात भी याद आई। इतने विविध रूपों में जीने वाली सुप्रिया से बेहद निजी सवाल पूछना इतना आसान भी न था।      
हमारी सुप्रिया अपनी जिंदगी अपनी पसंद से जीती है और उसकी पसंद मेरी पसंद है, क्योंकि मैं उसे बहुत प्यार करता हूँ।
विक्रम के रेस्ट हाउस के बगल में दूर तक चला गया पलाश का जंगल था। इस समय सारे ही पेड़ सुर्ख फूलों से भर गए थे। लगता था, जैसे सारा जंगल ही शोलों में बदल गया हो। उस रात देर तक वह बरामदे में बैठा लहरों की आवाज सुनता रहा और जब नींद से पलकें भारी होने लगीं तो जाकर गहरी नींद सो गया। अगली सुबह वह और अविनाश फार्म तक टहलने गए। अविनाश का काफी बड़ा फार्म था। उसने युकलिप्टस का जंगल भी लगा रखा था। अकसर वे दोनों साथ-साथ दूर तक टहलने चले जाते थे, फिर धीरे-धीरे सुप्रिया भी उनके साथ शामिल हो गई।

एक शाम जब वे दोनों अकेले थे, अविनाश ने उसे देखते हुए अचानक एक अजीब-सा सवाल किया। विक्रम, मेरी एक मदद करोगे? दरअसल इस जगह मैं सचमुच असहाय-सा हो गया हूँ। बात यह है ‍कि तीन साल पहले ही सुप्रिया अपनी पढ़ाई खत्म कर चुकी है। कायदे से अब उसकी शादी हो जानी चाहिए। माँ-बाबू जी के न रहने से यह जिम्मेदारी मेरी हो जाती है।
तो मुश्किल क्या है? विक्रम ने पूछा।
सुप्रिया शादी से इन्कार करती है।

ऐसा क्यों है, मैं नहीं जानता और सीधे उससे पूछने की मेरी हिम्मत नहीं होती। अगर ह किसी को पसंद करती है, तो भी कहे तो सही। मैं चाहता हूँ, तुम उससे पूछ लो। वह तुमसे खुल भी गई है।
मैं भला क्या पूछूँगा उससे! विक्रम उलझकर रह गया।
मेरे लिए इतना नहीं कर सकते?

ठीक है। कहकर विक्रम खामोश हो गया। उस रात एक बार फिर विक्रम की सोच सुप्रिया की ओर मुड़ गई। एकबारगी उससे पहली मुलाकात भी याद आई। इतने विविध रूपों में जीने वाली सुप्रिया से बेहद निजी सवाल पूछना इतना आसान भी न था।
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