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रेत के कणों का मिलन
अली और सलमा ने पूरा दिन दिल खोलकर बातें कीं। तूफान अपने तेवर दिखाता रहा पर उन्हें खबर नहीं थी। घंटों बीत गए, शाम हुई और रात ढलने लगी और अली की आँख लग गई। जब अली उठा तो गहरा अँधियारा फैला हुआ था और सलमा का कहीं पता नहीं था। वह मीनार के दरवाजे पर गया, देखा तो हवा बह रही थी पर तूफान थम गया था। उसने सलमा के पैरों के निशान ढूँढने की बहुत कोशिश की लेकिन कुछ भी नजर नहीं आया।

  अली ने जब आँखें खोली तो उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा उसे बचाने वाली और कोई नहीं सलमा ही थी। वह अली के चहरे को एकटक देख रही थी। वह मुस्कराई और बोली-'जब रेत के दो कण हवा उड़ा ले जाती है और वही हवा उन्हें जुदा भी करती है।      
अली बहुत दुःखी हो गया फिर भी वह रोना नहीं चाहता था। उसे चिंता भी हो रही थी कि सलमा कहाँ चली गई। उसने सोचा -'वह अरब की बेटी है और रेगिस्तान में अरब लोग तो रेत के कणों की तरह फैले हुए हैं। रेत केकणों की बात याद आते ही उसे सलमा के साथ गुजारा वक्त याद आ गया, वह और भी बेचैन हो गया। मैं सलमा को कैसे ढूँढ सकूँगा? कितने लोग होंगे जिनका नाम हुसैन होगा और उनकी बेटियों का नाम सलमा होगा। अब मैं क्या करूँ? उसने मुझे बताया भी नहीं कि वो कहाँ रहती है। दो रेत के कण तूफान में मिले और बिछुड़ गए। अब उन्हें फिर से कौन मिलाएगा?'

अली सलमा की तलाश में पागलों की तरह भटकने लगा। जहाँ-तहाँ सलमा के बारे में पूछता। सलमा के विछोह में वह बेहद दुखी हो गया। उसके बाल उलझ गए, कपड़े फट गए दाढ़ी लंबी हो गई। जिस भी गाँव जाता लोगों से एक ही प्रश्न पूछता-'हुसैन यहीं रहते हैं? जिनकी बेटी का नाम सलमा है?' लोग समझते यह आदमी पागल हो गया है और उसका मजाक बनाते- 'कितने लोग होंगे जिनका नाम हुसैन होगा और उनकी बेटी का नाम सलमा होगा। अब हमें क्या पता यह किस सलमा को तलाश कर रहा है?'

अली शहर से शहर और कस्बे से कस्बे घूमता रहा। न तो उसने कोई काम किया न ही कोई व्यवसाय अपनाया, बस वह तो अपने खोए प्यार के बारे में ही सोचता रहता। वह बहुत दुबला हो गया और उसके घोड़े की भी हालत खराब थी। एक दिन जोर की बरसात आई। नदी में पानी नहीं समाया और बाढ़ आ गई। अली और उसका घोड़ा पानी में डूबते-उतराते एक टीले पर चढ़ गए। उसके फेफड़ों में पानी भर गया था और भूख के मारे उसके पेट में खिंचाव हो रहा था। टीले पर पहुँचकर लगा कि अब उसके प्राण गए, उसे बेहोशी आने लगी। लेकिन तभी एक युवा लड़की ने उसके पेट से पानी निकाला और उसके घोड़े को भी खींचकर बचा लिया।

अली ने जब आँखें खोली तो उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा उसे बचाने वाली और कोई नहीं सलमा ही थी। वह अली के चहरे को एकटक देख रही थी। वह मुस्कराई और बोली-'जब रेत के दो कण हवा उड़ा ले जाती है और वही हवा उन्हें जुदा भी करती है। लेकिन जब दो रेत के कण एक दूसरे को पा लेते हैं तो वे हमेशा एक दूसरे के साथ रहते हैं और कभी जुदा नहीं होते!'
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