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ट्रिंग-ट्रिंग...
अंकित श्रीवास्तव
ND
वक्‍त काफी बीत गया है, लेकिन रश्‍मि के लिए सब कुछ पल भर पहले की बात है। लगता है कि बस कल की बात हो। उसने स्‍कूल की पढा़ई पूरी की और घर में जिद कर अपने शहर से दूर दूसरे शहर में आ गई। पढ़ाई में अच्‍छी होने के कारण घर में भी किसी ने खास ऐतराज नहीं जताया। गर्ल्‍स हॉस्‍टमेरहनलगीशुरू-शुरू में तो कुछ डर लगा, लेकिमुझतमापरेशानियों को सहने के बाद भी सब कुछ अच्‍छा लग रहा था

‘कॉलेज से हॉस्‍ट’ की जिंदगी से अलग भी उसने एक नई दुनिया बनाई थी। हालाँकि हमेशा की तरह यहाँ भी दोस्‍त कम, भीड़ ज्‍यादा थी। रश्‍मि ने इसे अपने मुताबिक आकार देने की कोशिश की। हॉस्‍टल में सभी लड़कियों के जगह-जगह से फोन आते रहते। मोबाइल फोन की लगातार बजती घंटियाँ उनके स्‍टेटस सिंबल बन चुकी थी। जिनके मोबाइल पर फोन आनगुंजाइनहीहोतहो अपने दो-चार पुरुष मित्रों के मोबाइल पर ‘मिस कॉल’ कर देतीं। मजाल है अब फोन नहीं आए

इस बात का मलाल उसे भी होता कि मेरे मोबाइल की घंटी क्‍यों नहीं बजतीखैर! कुछ दिनोबाद बार-बार बजती घंटी का राज मुझे मालूम हो गयाबीच उन लड़कियों के सभजरूरफोलैंड लाइन पर आते जिनके पास मोबाइल होने की खबर उनके घर वालों को नहीं होती। एक दिन शाम को मैं हॉस्‍टल पहुँची कि लैंड लाइन फोन की घंटी बजी। गार्ड ने जोर से आवाज दी-
‘रश्‍मि’..., रश्‍मि मैडम जी आपका फोन आया है।रश्‍मि तेजी से सीढ़ियों से उतरी। ‘किसका फोन है गार्ड भैया।’
‘वो तो नहीं पूछा मैडम, आही पूछ लीजि’। गार्ड ने गैरजिम्‍मेदारी के साथ जवाब दिया।

  हॉस्‍टल में सभी लड़कियों के जगह-जगह से फोन आते रहते। मोबाइल फोन की लगातार बजती घंटियाँ उनके स्‍टेटस सिंबल बन चुकी थी। जिनके मोबाइल पर फोन आने की गुंजाइश नहीं होती हो अपने दो-चार पुरुष मित्रों के मोबाइल पर ‘मिस कॉल’ कर देतीं।      
‘हैलो, कौन..?’, ‘कौन...?फोन पर किसी अपरिचित की आवाज थी।
उसे कुछ शंका हुई। कहीं किसी ने बदमाशी तो नहीं की। दुबारा हिम्‍मत कर उसने नाम पूछा। ‘कौन बोल रहे हैं आप?

‘सुशां’। ‘रश्‍मि है क्‍या?’ मैं ही बोल रही हूँ, आपको पहचाना नहीं­­...
‘शायद राँग नंबर लग गया’- कहकर उसने फोन रख दिया। रश्‍मि को घबराहट हो रही थी। मन में कई तरह के सवाल उठ रहे थे। कौन होगा, बदमाश तो नहीं लग रहा था। बदमाश होता तो फोन नहीं काटता। लड़कियों को क्‍या बताऊँगी, सच बताऊँगी तो बात का बतंगड़ बनाएँगी

दो-चार दिन बीत गए। बात आई-गई हो गई। किसी ने न पूछा और न उसने बताया। भला लड़कियों को अपने मोबाइल फोन से इस कोने से उस कोने चिपककर घंटों बात करने से फुर्सत कहाँ? आज रविवार था। एक बार फिर फोन की घंटी बजी। रश्‍मि का दिल न जाने क्‍यों पहले से ही धड़कने लगा। उसकी आशंका सच निकली

‘कौन?’, ‘आपको पता है कि राँग नंबर है तो दुबारा फोन क्‍यों किया?’ रश्‍मि झल्‍लाई।
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