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फाल्गुनी

ND
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स्याह रात में
नितांत अकेली,
मैं चाँद देखा करती हूँ
तुम्हारी जरूरत ही
कहाँ रह जाती है?
चाँद जो होता है
मुझमें, मेरे पास
तुमसा पर मेरे साथ
मुझे देखता,
मुझे सुनता,
मेरा चाँद
तुम्हारी जरूरत ही
कहाँ रह जाती है?
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