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तुम बहुत याद आते हो
फाल्गुनी

NDND
1. शरद रात्रि में,
प्रश्नाकुल मन,
बहुत उदास,
कहता है मुझसे,
उठो, चाँद से बातें करो
और मैं,
बहने लगती हूँ
श्वेत चाँदनी में, तब,
तुम बहुत याद आते हो।


2. भीगी चाँदनी में
ओस की
हर बूँद
तुम्हारी याद लगती है
जिसे छुआ नहीं जा सकता।
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'तुम' और 'मैं'
दूर खड़ी देख रही हूँ
मेरे सपनों में
यह मेरा मौन एकांत
ध्वस्त नहीं होने दूँगी