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मेरे सपनों में
फाल्गुन

मेरे सपनों में
स्नेह था,
ममत्व था,
औदार्य था
एक आकर्षण था
तुमने मुझे यथार्थ के 'अलार्म' से
उठा दिया अब मेरी उनींदी आँखों में
सपनों की खुमारी तो है, पर
स्नेह, ममत्व और औदार्य जैसे शब्दों को
असहाय सी
खोज रही हूँ
न वे शब्द मिल रहे हैं
और न उनके अर्थ,
तुम्हीं कर सकते थे
यह पीड़क अनर्थ।
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यह मेरा मौन एकांत
ध्वस्त नहीं होने दूँगी
तुम तो नीरे पतझड़ हो
गुजर गई हूँ मैं...!
फिर एक कहानी अधूरी
तुम ही कुछ लिखो