हर सुबह, हर शामजब खोलता हूँ आँखे तो तू ही नजर आती हैशरमाकर चुपचाप मेरे आगोश में छुप जाती है। तुझे धूप कहूँ या छाँव तुझे गीत कहूँ या राग छुईमुई सी है तू जो छूते ही सिमट जाती हैहर रात सपनों में तू मेरी बनकर आती है। जब देखता हूँ आइने में तो तेरी ही सूरत हर लड़की में दिखती है मुझे तेरी ही मूरत तू जादू है या हकीकत कुछ समझ नहीं आता हैहर रात मुझे नींद से कोई आकर जगाता है। |