श्रीमती शालिनी एक सीधी-सादी घरेलू महिला थीं। जैसे-जैसे उनके विवाह को वर्षों की गति मिलती गई, वे भौतिकतावाद के भँवर में फँसती चली गईं। 5 दिसंबर को जब उनकी छठी सालगिरह आने ही वाली थी कि उन्होंने अपने पति से उतना महँगा तोहफा माँग लिया जो उनका पति उन्हें कभी दे ही नहीं सकता था। और वे अपनी माँग पर अड़ भी गर्ईं। नतीजा यह हुआ कि अब वहाँ हँसी-खुशी की जिंदगी नहीं थी, उसकी जगह कलह एवं विवादों ने ले ली थी। जहाँ तक प्यार में शर्तों का सवाल है, यह केवल पति-पत्नी के बीच तक ही सीमित नहीं है। अब इसका दायरा बढ़ने लगा है। इन दायरों में पति-पत्नी, पिता-पुत्र, भाई-बहन, यार-दोस्त भी शामिल होने लगे हैं, जिन्हें केवल शर्तों से ही लगाव होता है। प्रेम से कोई लेना-देना नहीं होता। हम यूँ कह सकते हैं कि आज के इस युग में बगैर लेन-देन व शर्तों के प्यार अधूरा है। अगर आपने कुछ दे दिया है, तो समझ लीजिए कि प्यार जिन्दा है, नहीं तो सब कुछ खत्म। आज की मानसिकता ही ऐसी हो गई है। यूँ तो रक्षाबंधन भाई-बहन को एक-दूसरे से बाँधने का त्योहार है। परंतु इसमें भी कई लोग महज यह सोचकर आनंदित होते हैं कि कुछ उपहार मिलेगा। | | कहीं-कहीं तो यह भी देखा जाता है कि अगर एक भाई द्वारा कुछ दिया जाता है, तो वह अच्छा है और जो देने में समर्थ नहीं है, वह बुरा कहलाता है। इस तरह की बातें अक्सर परिवार में ही उजागर होती रहती हैं। |
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यहाँ कहते हुए सुना जा सकता है कि इस बार आप मुझे यह लाकर देना, मुझे यह चाहिए या यह भी कहा जाता है कि 'अरे, मैं तो कोई राखी-वाखी नहीं बाँधती उसे, क्या देगा वह मुझे?' और फिर शुरुआत होती है कड़वाहट की। इस तरह की शर्तों को जोड़कर रक्षाबंधन जैसे पवित्र त्योहार को भी बदनाम किया जा सकता है। कहीं-कहीं तो यह भी देखा जाता है कि अगर एक भाई द्वारा कुछ दिया जाता है, तो वह अच्छा है और जो देने में समर्थ नहीं है, वह बुरा कहलाता है। इस तरह की बातें अक्सर परिवार में ही उजागर होती रहती हैं। यह तो कोई प्यार नहीं हुआ। कायदे से प्यार और रिश्ते में कोई मोलभाव नहीं होना चाहिए, पर होता यही है। उपहार (सौदा) पहले ही तय हो जाता है, इस कड़वे सच को स्वीकार करना ही होगा। |