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क्‍या आप मेरे साथ बूढ़ी होंगी...
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- अंकिश्रीवास्‍त

प्रेम की अभिव्‍यक्‍ति निराली है। प्रेम करना तो आसान है लेकिन इसे बयाँ करने में अच्‍छे-अच्‍छे सूरमाओं के पसीने छूट जाते हैं। जो बोल नहीं पाते वो ख़त लिखते हैं। कुछ तो सिर्फ आगे-पीछे डोलते रहते हैं। वैसे ऐसा भी माना जाता है कि है प्‍यार आँखों की भाषा है।

इसे लब्‍जों में ढालने की जरूरत नहीं होती है, लेकिन ऐसा हमेशा नहीं होता है और प्रेमी-प्रेमिकाओं में इस बात की साध होती है कि उन्‍हें भी ‘को’ इजहार-ए-मुहब्‍बत करता। लाजिमी है, अच्‍छा सुनना सभी को अच्‍छा लगता है। लेकिन इजहार करने वालों की धुकधुकी उस समय बंद हो जाती है, जब इजहार ही अंतिम रास्‍ता हो। ये ज्‍यादातर तब होता है, जब कबाब में हड्डी यानी कोई दूसरा भी कतार में खड़ा हो।

खैर, हम अपनी बात पर आते हैं। बात उन दिनों की है, जब मैं स्‍कूल की पढ़ाई पूरी कर कॉलेज में गया था। को-एजुकेशन में पढ़ाई करने के कारण साथ में लड़कियों और लड़कों का रेला था।

कुछ लड़के, लड़कियों को लुभाने के लिए तमाम जतन करते। मसलन, नई रिलीज हुई फिल्‍म के हीरो की तरह कपड़ा पहनना, फुटपाथ से हीरो जैसा 25 रुपए वाला चश्‍मा लगाना और बार-बार उसे स्‍टाइल से पॉकेट में रखना, वगैरह-वगैरह। लेकिन प्‍यार के दो बोल उनकी हलक में ही अटक जाते थे।
  प्रेम की अभिव्‍यक्‍ति निराली है। प्रेम करना तो आसान है लेकिन इसे बयाँ करने में अच्‍छे-अच्‍छे सूरमाओं के पसीने छूट जाते हैं। जो बोल नहीं पाते वो ख़त लिखते हैं। कुछ तो सिर्फ आगे-पीछे डोलते रहते हैं। ऐसा भी माना जाता है कि है प्‍यार आँखों की भाषा है।      


हमारे साथ ही विनोद भाई भी पढ़ा करते थे। ‘भा’ इसलिए कि वो हम सबसे उम्र में काफी बड़े थे। तो विनोद भाई का दिल आ गया, साथ ही पढ़ाई करने वालशुभांगी पर। नाम के अनुरूप ही शुभांगी खूबसूरत थी और उसे इस बात का नाज भी था। वैसे उसे चाहने वालों में विनोद भाई अकेले नहीं थे। कतार लंबी थी। इस बात से वो भी वाकिफ थे। सो सभी को बता दिया कि शुभांगी उनकी ‘अमान’ है। किसी के दिल में कोई भी बुरा ख्‍याल हो तो उसे बाहर निकाल दे। इसके लिए विनोद ‘भाईगिर’ भी कर सकते थे। लेकिन उन्‍होंने सोचा की इससे शुभांगी पर गलत इंप्रेशन पड़ेगा। उम्र और शरीर सौष्‍ठव से पहले भी पूरा कॉलेज डरता था और कहीं उन्‍होंने बाहर वाले कैंटीन में बुला लिया तो सामने वाले की बैंड बजा देते।
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