मुख्य पृष्ठ > विविध > रोमांस > इजहार-ए-इश्क
सुझाव/प्रतिक्रियामित्र को भेजियेयह पेज प्रिंट करें
 
जब प्यार किसी से होता है
KaptanND
वास्तव में प्रेम देने की प्रवृत्ति है, इसमें लेने की आकांक्षा नहीं रहती। दो व्यक्तियों के बीच जब यह अतिशय कोमल संबंध अंकुरित होता है तब एक साथ बहुत कुछ घटित होता है, समूचा व्यक्तित्व महकता उपवन हो जाता है और रोम-रोम से सुगंध प्रस्फुटित होने लगती है। प्रेम, जिसमें उत्फुल्लता का उत्तुंग शिखर भी मुस्कराता है और वेदना की अतल गहराई की भीगी खामोशी भी व्यक्त होती है। सच्चा और मासूम प्रेम बस प्रिय की समीपता का आकांक्षी होता है। प्रशंसा की मंशा और निर्निमेष दृष्टि से देखने की भोली इच्छा से आगे शायद ही कुछ सोचता है। अधिक हुआ तो कोमल स्वीकारोक्तियाँ निवेदित करने की, सुकुमार भावों से अभिव्यक्ति की या फिर प्रिय पात्र के ऊपर विपुल मोहकता और स्पृहणीयता आरोपित करने की भावना होती है। प्रेमियों के लिए एक-दूसरे की संगति अत्यंत मूल्यवान होती है, उसकी उपलब्धि के लिए वे सदैव सचेष्ट रहते हैं।

प्यार एक विलक्षण अनुभूति है। समूचे विश्व में आज भी इसकी खूबसूरती और मधुरता की मिसालें कायम की जाती हैं। इस सुकोमल मनोभाव पर सदियों से बहुत कुछ लिखा, पढ़ा और सुना जाता रहा है, बावजूद इसके इसे समझने में भूल भी होती रही है। मनोवैज्ञानिकों ने इस मीठे अहसास की भी गंभीर तात्विक विवेचना कर डाली, लेकिन फिर भी मानव मन ने इस शब्द की आड़ में छला जाना जारी रखा है। प्रेम को महापुरुषों ने ईश्वरीय स्वरूप माना है। महान विचारक लेमेन्नाइस कहते हैं, 'जो सचमुच प्रेम करता है, उस मनुष्य का हृदय धरती पर साक्षात्‌ स्वर्ग है, ईश्वर उस मनुष्य में बसता है क्योंकि ईश्वर प्रेम है।' लूथर के विचार हैं, 'प्रेम ईश्वर की प्रतिमा है और निष्प्राण प्रतिमा नहीं, अपितु दैवीय प्रकृति का जीवंत सार, जिससे कल्याण के गुण छलकते रहते हैं।'

प्यार करने वाले व्यक्ति में अपने प्रिय पात्र को सुख पहुँचाने और संरक्षण देने का आवेग सबसे प्रबल होता है। वह वो सब कुछ करने को तत्पर रहता है जो प्रिय व्यक्ति को हर्षित कर सकता है। प्यार की गहराई इस हद तक भी होती है कि चोट एक को लगे तो दर्द दूसरे को हो या उदास एक हो तो आँसू दूसरे की आँखों में छलक जाएँ। इस प्रकार की प्रगाढ़ अनुभूतियाँ प्रेम के अवयवों में परिगणित की जाती हैं। इन अनुभूतियों में परकेंद्रितता का बाहुल्य होता है। इस तरह की सुकुमारता बरतने से एक सुशिष्ट तृप्ति का आभास होता है। इन नर्म नाजुक भावनाओं की अभिव्यक्ति कई रूपों में होती है। बड़ी-बड़ी त्यागमयी उदारताओं से लेकर छोटे-छोटे सुविचारित कार्य अथवा अनूठे उपहार तक। इन अभिव्यक्तियों का मूल्य इस बात पर निर्भर नहीं करता कि जो कुछ किया जा दिया गया है, वह कितना महान है बल्कि उन भावनाओं पर निर्भर करता है जो इन अभिव्यक्तियों द्वारा सम्प्रेषित होती हैं। अक्सर इन स्नेहिल उपहारों में सर्वाधिक मुखरता तब आती है जब एक नन्हा-सा प्रतीक भी अपने भीतर एक विराट अर्थ को समेट लेता है।
1 | 2  >>  
और भी
संपूर्ण समर्पण भाव अर्थात प्रेम
सच्चा प्यार...
पहली नजर का प्यार...
प्यार की सार्थकता
अगर है प्यार तो जरुरी है इजहार...
क्यों होता है प्यार?