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'पढ़ोगे-लिखोगे बनोगे नवाब, खेलोगे-कूदोगे होगे खराब।' इस पुरानी कहावत को बनारस और भदोही के दो नौजवानों ने अपनी लगन, मेहनत और मशक्कत के बलबूते पलट कर रख दिया है। कभी अपने गाँव में खारिज किए जा चुके इन दोनों नौजवानों को इन दिनों अमेरिकी जनता सिर-माथे पर बिठाकर घूमने को आतुर है। इन्होंने अमेरिका के राष्ट्रीय खेल बेसबाल में इस तरह की शोहरत हासिल की है कि जिस एयरपोर्ट पर सुरक्षाकर्मियों ने सिने स्टार शाहरुख खान को तीन घंटे तक रोककर रखा था उसी एयरपोर्ट के सुरक्षाकर्मी इन दोनों नौजवानों के आटोग्राफ के लिए घंटों लाइन पर खड़े दिखे।

गरीबी और अभाव के बीच पले भदोही के रिंकू और बनारस के दिनेश पटेल ने अमेरिका में भारत का परचम लहरा दिया है। ये दोनों पहले पेशेवर भारतीय बेसबाल खिलाड़ी बनने में कामयाब हुए हैं। फर्श से अर्श तक का इनका सफर किसी परी कथा से कम रोचक नहीं है। यही वजह है कि भदोही के होलेपुर गाँव के रिंकू की ही नहीं बल्कि अन्य लोगों की खुशियाँ भी थामे नहीं थम रही हैं।

अमेरिका के राष्ट्रीय खेल बेसबाल में रिंकू अपना परचम लहराकर गाँव आया है। उसे फूल-मालाओं से लादा जा रहा है। आरती उतारी जा रही है। रिंकू के कोच जेबी बर्नस्टाइन बड़े गर्व से बताते हैं, 'ये पहले भारतीय हैं जो अमेरिका में बेसबाल खिलाड़ी बने हैं।'

रिंकू और दिनेश का मन पढ़ाई की जगह खेल में रमता था। लखनऊ स्पोर्ट्स हास्टल के जैवलिंग थ्रो खेल में प्रशिक्षण के लिए प्रवेश तो हुआ लेकिन फीस न होने की वजह से दिनेश को बनारस लौटकर ईंट गारा ढोने की मजदूरी करनी पड़ी। इसी दौरान वर्ष 2007-08 में अमेरिका का एक ग्रुप बेसबाल को लोकप्रिय बनाने भारत आया था। इस ग्रुप की ओर से एक मिलियन डालर अमर्स कांटेस्ट का आयोजन हुआ। इसमें रिंकू को पहला और दिनेश को दूसरा स्थान मिला।

दिनेश कहता है, 'कभी-कभी तो लगता है सपना देख रहा हूँ।' ये दोनों खिलाड़ी अमेरिका में पीटर्स बर्ग पाइरेट्स क्लब की ओर से खेल रहे हैं। इनकी सफलता पर अमेरिका की सोनी पिक्चर्स ने फिल्म बनाने का ऐलान किया है, जो 2011 तक प्रदर्शन के लिए उपलब्ध हो जाएगी। इन दोनों नौजवानों ने इस अमेरिकी खेल को कितना लोकप्रिय किया है यह इनके कोच खुद बयान करते हैं, 'अमेरिका में 67 फीसदी लोग इन्हें जानते हैं।'
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