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उच्च शिक्षा पाने के लिए भारतीय छात्र अक्सर अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों को प्राथमिकता देते हैं। इसके कारण साफ हैं- अमेरिका जैसे पश्चिमी देशों में शिक्षा का उच्च स्तर और अँगरेजी। जैसे-जैसे भारत आर्थिक प्रगति की राह पर बढ़ता चला गया, वैसे-वैसे मध्य वर्ग के लिए अपने बच्चों को अमेरिका औऱ ब्रिटेन में महँगी शिक्षा दिलाने का सपना भी साकार होने लगा। फिर भी वैश्वीकरण के इस युग में अब भारतीय छात्र चीन के अलावा कई अन्य योरपीय देशों में उच्च शिक्षा हासिल कर रहे हैं। योरपीय संघ भी भारतीय छात्रों को उच्च शिक्षा के लिए अपने देशों की तरफ आकर्षित कर रहा है।

ऑस्ट्रेलिया में पिछले समय भारतीय छात्रों पर हुए हमलों की वजह से छात्र अब योरपीय देशों की तरफ और ज्यादा आकर्षित हो रहे हैं। पिछले पाँच वर्षों में अध्ययन केंद्रों और उच्च शिक्षा संस्थानों में भारतीयों की संख्या बढ़ी है। मिसाल के तौर पर जर्मन शहर बॉन में माक्स-प्लांक अध्ययन संस्था ने भारतीय छात्रों को जर्मनी में पढ़ने के लिए खास रियायतें दी हैं।

योरपीय संघ (ईयू) और भारत के बीच इस समय भले ही राजनीतिक स्तर पर ताल्लुकात आगे नहीं बढ़ पाए हों, लेकिन 2004 में दोनों के बीच सामरिक संबंध स्थापित हो जाने के बाद शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में भी संवाद और संबंध शुरू हो गए थे। भारत और योरपीय संघ, दोनों मानते हैं कि उन्हें एक-दूसरे के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं मिल पा रही है। इसी साल दोनों के बीच संस्कृति और भाषाओं के आदान-प्रदान पर भी समझौता हुआ है। भविष्य में राजनीतिक, व्यापारिक या फिर अन्य सहयोग के लिए एक-दूसरे के बारे में जानना जरूरी है और इसके लिए शिक्षा से बेहतर कोई माध्यम नहीं है।

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एक कारण यह भी है कि कई योरपीय देशों में पढ़ाई, अमेरिका की तुलना में सस्ती है। उदाहरण के तौर पर स्वीडन में सरकार निःशुल्क शिक्षा देती है और विदेशी छात्रों को पूर्ण छात्रवृत्ति भी दे सकती है। आँकड़े बताते हैं कि हर साल भारत से करीब डेढ़ लाख विद्यार्थी उच्च शिक्षा के लिए विदेश जाते हैं। योरपीय संघ के देशों में भारतीय छात्रों की संख्या बढ़ रही है, पिछले साल 1700 विद्यार्थी फ्रांस गए थे जबकि 4500 छात्रों ने जर्मनी को चुना। कुल मिलाकर योरप में शिक्षा पा रहे छात्रों में चीन के बाद भारत का दूसरा स्थान है।

उच्च शिक्षा के लिए योरपीय संघ अपने 27 सदस्य देशों में पढ़ने और रहने का एक अनोखा मौका देता है। इन देशों में 900 से अधिक विश्वविद्यालय और उच्च शिक्षा संस्थान एमबीए से लेकर विज्ञान और कला के क्षेत्र में कोर्स उपलब्ध करा रहे हैं। ब्रिटेन की तुलना में इटली, जर्मनी या फ्रांस जैसे देशों में भाषा एक सीमा हो सकती है, लेकिन इसे खामी न मानकर चुनौती के रूप में लिया जाए तो छात्रों के लिए अन्य देशों में भी पढ़ने और काम करने की संभावनाएँ बढ़ जाती हैं। योरपीय संघ भी अँगरेजी नहीं बोलने वाले देशों में छात्रों को आकर्षित करने की कोशिश कर रहा है। फ्रांस और जर्मनी में कई नए अँगरेजी भाषी कोर्स शुरू किए गए हैं।

योरपीय संघ द्वारा शुरू किए गए एरास्मुस मुंडस नामक अंतरराष्ट्रीय शिक्षा कार्यक्रम के अंतर्गत योरप में पढ़ने के लिए विदेशी छात्रों को दी गई छात्रवृत्ति में भारत सबसे आगे है। 2008 में कुल 6181 छात्रों को दी गई स्कॉलरशिप में भारत 1103 छात्रों के साथ पहले स्थान पर रहा, अध्ययन के क्षेत्र में 1125 विद्वानों में से 90 भारत से ही थे। योरपीय आयोग द्वारा शुरू किए गए इस कार्यक्रम के लिए 2009 से 2013 तक 95 करोड़ यूरो का बजट तय किया गया है। इतना धन होने के बावजूद, योरपीय संघ के स्कॉलरशिप कार्यक्रम के बारे में भारत में जानकारी कम है। बहुत कम छात्रों को पता होगा कि इस कार्यक्रम में छात्रवृत्ति हासिल करने के बाद योरप के दो अलग-अलग शहरों के दो प्रतिष्ठित योरपीय विश्वविद्यालयों से डिग्रियाँ हासिल की जा सकती हैं।

एरास्मुस मुंडस स्कॉलरशिप के तहत योरप में दो या दो से ज्यादा शिक्षा संस्थानों में पढ़ने का मौका मिलता है। इसके लिए चुने जाने पर हर विश्वविद्यालय में एक-एक साल पढ़ने का मौका मिलता है। इस स्थिति में फ्रांस के विश्वविद्यालय के साथ-साथ इटली या ब्रिटेन के विश्वविद्यालय में भी पढ़ा जा सकता है, लेकिन भारत में इस बारे में दिलचस्पी होने के बावजूद इस कार्यक्रम का प्रचार ठीक से नहीं हो पा रहा है। सिद्धू वॉरियर नाम के एक छात्र ने अपने ब्लॉग में लिखा है कि इंटरनेट पर सर्फ करते हुए अचानक एरास्मुस स्कॉलरशिप के बारे में पता चला।

अमेरिकी मैनेजमेंट कॉलेजों की तुलना में योरपीय संस्थाओं में पढ़ने के लिए केवल अँगरेजी भाषा के एक टेस्ट और स्कूल में अच्छे नंबरों की जरूरत होती है। भारत-ईयू शिक्षा में सहयोग के तहत पिछले साल भारत-ईयू समझौता हुआ, जिसमें योरपीय संघ की सहायता से भारत के विभिन्न विश्वविद्यालयों में छः नए भारत-ईयू स्टडी सेंटर खोले जा रहे हैं। इसमें दोनों के बीच शिक्षा सहयोग तो होगा ही, भारत में योरपीय मामलों की पढ़ाई को भी बढ़ावा दिया जाएगा। आईआईटी मद्रास, मणिपॉल विश्वविद्यालय और दिल्ली विश्वविद्यालय जैसे प्रतिष्ठित भारतीय विश्वविद्यालय इस सहयोग में शामिल हैं। इसके अलावा योरपीय विश्वविद्यालयों में मॉडर्न भारतीय इतिहास स्टडी सेंटर भी खोले जा रहे हैं। यह भारत और ईयू के बीच बेहतर समझ बढ़ाने की एक कोशिश है।

लेकिन दिल्ली विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग में भारत-ईयू स्टडी सेंटर की स्थापना पर कुछ शिक्षक ऐतराज भी कर रहे हैं। बताया जाता है कि तीन लाख यूरो की लागत वाले सेंटर पर शिक्षकों और कर्मचारियों का कहना है कि उन्हें इस सेंटर के काम को लेकर अँधेरे में रखा जा रहा है। कुछ शिक्षकों को लगता है कि इसी साल शुरू किए गए सेंटर के कारण पढ़ाई के कोर्सों में बदलाव आ सकता है।

ब्रिटेन की तुलना में इटली, जर्मनी या फ्रांस जैसे देशों में भाषा एक सीमा हो सकती है, लेकिन अगर इसे खामी न मानकर चुनौती के रूप में लिया जाए तो छात्रों के लिए अन्य देशों में भी काम करने की संभावनाएँ बढ़ जाती हैं । योरपीय संघ भी अँगरेजी नहीं बोलने वाले देशों में छात्रों को आकर्षित करने की कोशिश कर रहा है। फ्रांस और जर्मनी में कई नए अँगरेजी भाषी कोर्स शुरू किए गए हैं।
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