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ब्रिटिश संसद में एक बार फिर गूँजी हिन्दी
कथा यू.के. के महासचिव तेजेन्द्र शर्मा ने कहा कि ब्रिटिश संसद में हिन्दी की बात करके हम सच्चे अर्थों में विश्व बंधुत्व की ओर बढ़ रहे हैं। उन्होंने टोनी मैक्नलटी का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि उन्होंने हिन्दी को स्वीकृति देकर, ब्रिटेन की लोकतांत्रिक परम्परा को आगे बढ़ाया है। इस अवसर पर उन्होंने ब्रिटेन में बसे हिन्दी प्रेमियों के लिए भारतीय प्रकाशकों के सहयोग से कथा यू.के. द्वारा एक बुक क्लब शुरू करने की सूचना दी। इसके माध्यम से यहाँ के हिन्दी पाठकों को श्रेष्ठ हिन्दी पुस्तकें घर बैठे उपलब्ध हो सकेंगी।

साक्षात्कार और रचना समय के संपादक हरि भटनागर ने नासिरा शर्मा की पुरस्कृत कृति कुइयां जान का परिचय देते हुए कहा कि कुइयां जान मनुष्य की आदिम प्यास (एक तरह से मनुष्य की जिजीविषा) की जद्दोजहद का पर्याय है। लेखिका ने इसी जिजीविषा को उपन्यास की विषयवस्तु बनाया है और इसी के बहाने वे भारतीय समाज की अंतरंग जीवन झाँकी प्रस्तुत करती हैं।

'अपने कहन में' उपन्यास सुख-दु:ख, प्यार-मुहब्बत, विडम्बना का एक ज्वलन्त रचनात्मक दस्तावेज़ है जिसके बयान में कहीं अश्रुगलित भावुकता नहीं, कहीं चीख़-पुकार नहीं। उपन्यास अपनी जातीय परम्परा की एक कड़ी है, एक रचनात्मक इतिहास है। अपने शिल्प में यह उपन्यास आधुनिक गद्य लेखन का ऐसा नमूना है जिसमें भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, बालकृष्ण भट्ट से लेकर मुंशी प्रेमचन्द, निराला और हरिशंकर परसाई के गद्य शिल्प का विकसित नया रूप देखा जा सकता है।

इस अवसर पर अपने आभार वक्तव्य में नासिरा शर्मा ने कहा, कुइयां जान हमारी परम्परा और रिश्तों की प्यास की बात करता है। पानी रिश्तों को प्रभावित करता है। मैंने इस उपन्यास में मौसम की ख़ुशबू और बदबू को दिखाने की कोशिश की है। तेजेन्द्र शर्मा ने मेरे लिए एक ऐसा रास्ता खोला है जिससे ज़िन्दगी और मुहब्बत की दोबारा शुरुआत हो सकती है। मैंने अपने शहर इलाहाबाद पर चार उपन्यास लिखे, लेकिन उस शहर ने मुझे कभी नहीं बुलाया। ब्रिटेन आने के लिए वीज़ा हासिल करने की प्रक्रियाओं से गुज़रते हुए मुझे अहसास हुआ कि हम लेखक, दुनिया के सबसे मज़लूम और मुसीबतज़दा लोग हैं।

पद्मानंद साहित्य सम्मान प्राप्त करने वाली उषा वर्मा ने प्रवासी जीवन में हिन्दी लेखन की समस्याओं का ज़िक्र करते हुए कहा कि निरन्तर लेखन में कई प्रकार की बाधाएँ खड़ी हो जाती हैं।

लेखन की गाड़ी रुक-रुक कर चलती है। ऐसे में जब हमारे साहित्य को सराहा जाता है, उसकी प्रशंसा होती है, तो मन में कहीं अच्छा लगता है। संघर्ष, उदासी और आकांक्षाएँ, सबको रचना में समेटना आसान नहीं होता। हम लेखक मन के दर्द को रचना में डालते हैं। ब्रिटेन में दक्षिण एशियाई परिवारों के बीच काम करते हुए मुझे जो अनुभव हुए उन्हें ही मैंने अपनी रचना का आधार बनाया है। उषाजी ने अपने बचपन की यादों को भी श्रोताओं के साथ बाँटा और कथा यू.के. को धन्यवाद दिया।

लंदन में भारतीय उच्चायोग के हिन्दी एवं संस्कृति अधिकारी राकेश दुबे ने उषा वर्मा के पुरस्कृत कथा संग्रह कारावास का परिचय दिया। सनराइज़ रेडियो के प्रसारक रवि शर्मा ने कुइयां जान के अंशों का अभिनय पाठ किया। वरिष्ठ पत्रकार अजित राय ने नासिरा शर्मा के मानपत्र का पाठ किया वहीं मुंबई की मधुलता अरोड़ा ने उषा वर्मा का मानपत्र पढ़ा। कार्यक्रम का संचालन डॉ. निखिल कौशिक ने किया।

बीबीसी हिन्दी सेवा के पूर्व प्रमुख कैलाश बुधवार, प्रगतिशील लेखक संघ के सचिव के.सी. मोहन, वरिष्ठ फ़िल्म पत्रकार (मुंबई) सुमन्त मिश्र, कथा यू.के. के कोषाध्यक्ष रमेश पटेल, अमरदीप के संपादक जगदीश मित्तर कौशल, गीतांजलि बर्मिंघम के अध्यक्ष डॉ. कृष्ण कुमार, सुप्रसिद्ध नाटककार इस्माइल चुनारा, भारतीय भाषा संगम, यॉर्क के अध्यक्ष डॉ. महेन्द्र वर्मा, ग़ज़लकार सोहन राही, मोहन राणा, महेन्द्र दवेसर, कादम्बरी मेहरा, चंचल जैन, डॉ. वंदना शर्मा, चित्रा कुमार, दयाल शर्मा, वेद मोहला, कृष्ण भाटिया सहित कार्यक्रम में शामिल होने के लिए वेल्स, यॉर्क, बर्मिंघम एवं अन्य दूरदराज़ के शहरों से मीडिया, साहित्य, उद्योग एवं सांस्कृतिक क्षेत्र के प्रतिनिधि पहुँचे।
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