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ब्रिटिश संसद में एक बार फिर गूँजी हिन्दी  Search similar articles
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लंदन के ब्रिटिश संसद के उच्च सदन हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स में एक बार फिर हिन्दी गूँजी उठी। ब्रिटिश सरकार के आंतरिक सुरक्षा राज्यमंत्री टोनी मैक्नलटी ने शुक्रवार की शाम सुप्रसिद्ध लेखिका नासिरा शर्मा को उनके उपन्यास कुइयां जान के लिए 14वाँ अंतरराष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान प्रदान किया। इस अवसर पर उन्होंने ब्रिटेन के हिन्दी लेखकों के लिए स्थापित पद्मानंद साहित्य सम्मान से यॉर्क की उषा वर्मा को नवाजा।

कथा यू.के. द्वारा हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स में आयोजित सम्मान समारोह में ब्रिटेन के आंतरिक सुरक्षा राज्यमंत्री टोनी मैक्नलटी ने हिन्दी में अपने भाषण की शुरुआत की। उन्होंने कहा कि राजा और रानियाँ, मंत्री और प्रधानमंत्री भुला दिए जाते हैं, लेकिन साहित्य को लोग याद रखते हैं। आज हम शेक्सपीयर को ज़रूर जानते हैं लेकिन यह नहीं जानते कि उस समय के राजा या प्रधानमंत्री कौन थे। उन्होंने कहा कि लेखकों और दार्शनिकों ने हमारे इतिहास और सभ्यता का निर्माण किया। हम राजनेताओं ने नहीं।

टोनी मैक्नलटी ने अपने बचपन का हवाला देते हुए कहा कि उनके पिता चौदह साल की उम्र में आयरलैंड से लंदन आकर बस गए थे। उस समय अँग्रेजी का ठीक से उच्चारण न कर पाने कि लिए आयरिश लोगों का मज़ाक उड़ाया जाता था, लेकिन आज हम सभी जानते हैं कि आयरलैंड की परम्परा और संस्कृति किसी से भी कम नहीं है। उन्होंने ब्रिटेन में बसे एशियाई लेखकों की चर्चा करते हुए कहा कि हम अँग्रेज भले ही उनकी भाषा न समझें लेकिन हमें उनकी भावना और उत्साह का आदर करना चाहिए क्योंकि वे बड़ी संस्कृतियों के वारिस हैं।

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आज उनकी नई पीढ़ी पूरब और पश्चिम की संस्कृति के बीच दुविधाग्रस्त खड़ी है। उन्होंने आगे कहा कि राजनेताओं के लिए सबसे अधिक ख़ुशी का क्षण वह होता है जब वे साहित्य का आनन्द उठाते हैं। कारण कि साहित्य किसी देश, राष्ट्र, भाषा, जाति जैसी सभी सीमाओं को लाँघ कर पूरी मानवता की बात करता है। इसीलिए मैं कथा यू.के. के काम की सराहना करता हूँ और संरक्षक के रूप में इससे जुड़ा हूँ।

लेबर पार्टी की काउंसलर ज़कीया ज़ुबैरी ने इस बात पर चिंता प्रकट की कि एशियाई समाज की नई पीढ़ी अपनी मातृभाषाओं से लगातार दूर होती जा रही है। ब्रिटेन में पहली पीढ़ी के आप्रवासी ही अपनी भाषा और संस्कृति के प्रति प्रतिबद्ध हैं। उन्होंने कहा कि यह एशियाई लोगों की घर-घर की कहानी है कि उनके बच्चे लगातार उनकी संस्कृति से दूर जा रहे हैं।

हमारे लेखकों को इस बारे में भी सोचना चाहिए। कथा यू.के. उन उम्दा किताबों को सम्मानित करती रही है जिन पर भारतीय आलोचकों ने ठीक से ध्यान नहीं दिया। इस प्रकार कथा यू.के. ने उस श्रेष्ठ साहित्य को सम्मानित किया है, जो किसी वजह से हाशिए पर चला गया था।
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