मुख पृष्ठ > विविध > एनआरआई > एनआरआई साहित्य > नि:शब्द प्रेम प्रतिज्ञा
सुझाव/प्रतिक्रियामित्र को भेजिएयह पेज प्रिंट करें
 
नि:शब्द प्रेम प्रतिज्ञा
- सुधीर पाण्डेय
nri poem
GN

सीले सिरहाने पर रख छोड़ा है
एक तेरा स्वप्न अधूरा गीला-सा
तुम हो जिसमें मैं हूँ और
वो वर्षों का एकाकीपन है
तेरी लाज के आँचल पर
अब तक ठिठका मेरा मन है।

सिमटे सकुचे ‍तुम बैठे थे जैसे
उस पहली अपनी मुलाकात में
अब भी वैसे ही मिलते हो मुझको
हर भीगी सीली श्यामल रात में।

अपनी मृग-चंचल आँखों में
एक मदहोश शरारत से-
नि:शब्द ही कह जाते हो
चिर-पुरातन अपनी प्रेम-प्रतिज्ञा।

जिसके बंधन में ही
मेरी मुक्ति का सार छिपा है
जिसकी परिधि में ही
मेरा सारा संसार बसा है।

अपनी आहों से छूता हूँ
हर दिन तेरी कोमल श्र्वासों को
अपनी तृष्‍णा की तृप्ति को
पी‍ता हूँ तेरी प्यास के प्यालों को।

स्वप्न रहे थे तुम
स्वप्नों में ही पाता हू,
अपनी नि:शब्द प्रेम प्रतिज्ञा को
ऐसे ही हर शाम निभाता हूँ।

साभार- गर्भनाल
संबंधित जानकारी खोजें
और भी
कौन शख्स था वह?
लक्ष्य
क्या हुआ?
रहस्य
समय की निष्ठुर गतिशीलता का चित्रण
संत खरगोश