सुधीर सबको अपने घर में देखकर बहुत खुश हुआ। उसने तुरंत मि. पंत और ताईजी को फोन किया और वे तुरंत उनसे मिलने चले आए। ताऊजी के कारण सुधीर को मिले वैभव को देखकर सभी आनंद विभोर हो रहे थे। मि. पंत ने सुधीर को अपने परिवार के साथ खिलखिलाते देख चैन की साँस ली। मि. पंत ने सुधीर के छोटे भाई सुनील को उसकी शिक्षा और योग्यता के अनुसार कंपनी में काम दे दिया। सुधीर ने सतीश और श्वेता को पढ़ाने के लिए कॉलेज में एडमिशन दिला दिया। शहर की रौनक एवं बड़े भाई के स्नेह से सभी के चेहरे खिल गए।
माँ बच्चों और तमाम सुख-सुविधाओं के बीच रहकर खुश तो थी लेकिन रह-रहकर उसे पति की याद भी सताती थी। 'समय से चाय, खाना-पानी करते होंगे या नहीं? कहीं तबीयत तो खराब नहीं हो गई? क्या सोचते होंगे, मेरे इस तरह चले आने पर? आदि विचार उसके मन में कौंधते रहते। एक पति परायण भारतीय नारी अपने निर्मोही और नृशंस पति के प्रति इतनी कर्तव्यनिष्ठ हो सकती है, कोई सोच भी नहीं सकता। उसे अपने किए पर पछतावा हो रहा था। पश्चाताप की अग्नि में जलते हुए एक दिन उसके प्राण-पखेरू उड़ गए। पिता को सूचना दी गई लेकिन वे नहीं आए।
यह तो अच्छा हुआ कि सुधीर ने माँ के जीवित रहते श्वेता की शादी बड़े धूमधाम से कर दी थी। कम से कम माँ चैन से मर तो सकी। चैन से जी तो वह कभी नहीं पाई। जाते-जाते अपनी दो पुत्रवधुओं का मुँह देख गई थी। बाकी सुधीर पर उन्हें पूरा भरोसा था। सुधीर उनके जीवन का सबसे बड़ा वरदान था।
इधर मि. पंत का स्वास्थ्य कुछ गिरने लगा था, पर वे पूरी तरह आश्वस्त थे। उन्हें किसी प्रकार की कोई चिंता नहीं थी। एक दिन सुधीर ने मि. पंत से कहा- 'मैं आपके बच्चों को फोन करके आता हूँ।' मि. पंत ने बड़ी सहजता से कहा- 'कर देना, जल्दी क्या है? माना कि तुम मेरी संतान नहीं हो, पर संतान से कम हो क्या?' यह सुनकर सुधीर अवाक रह गया। मि. पंत उसे इस हद तक चाहते थे, यह उसने आज जाना। उसने उनके तीनों बच्चों को फोन कर दिया था।
बच्चे अपने पिता की अर्थी को कंधा देने के लिए नहीं पहुँच सके लेकिन त्रयोदशी संस्कार तक अवश्य पहुँच गए थे। उन्हें सुधीर पर फख्र था कि सुधीर ने पुत्रवत उनके डैडी का अंतिम संस्कार किया था। इधर सुधीर परेशान था कि मि. पंत ने ऐसा क्यों किया, उसके नाम सब कुछ कर दिया? यह संपत्ति तो उनके बच्चों को मिलनी चाहिए, इसे मैं उनके नाम ट्रांसफर कर दूँगा। मि. पंत के पुत्र धीरेन्द्र ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा- 'तुम्हें ऐसा करने की जरूरत नहीं है। हमें सब मालूम था। हम तीनों की मर्जी से यह सब हुआ है। विश्वास न हो तो पूछ लो सबसे।' 'लेकिन क्यों' सुधीर ने विचलित होकर पूछा। हमारे पास हमारे लिए बहुत है।' सभी ने एकसाथ उत्तर दिया।
'लेकिन मैं इतनी संपत्ति का क्या करूँगा?' सुधीर ने रुआँसा होकर पूछा।
'तुम्हारे लिए करने को बहुत कुछ है। तुम उन प्रतिभाओं की मदद कर सकते हो जो देश का गौरव बन सकती हैं।' धीरेन्द्र ने कहा तो पलक झपकते ही सब समझ गया और एकदम शांत हो गया।
ईमान की उपज भी ईमान ही थी। सच पूछो तो किसी को कुछ भी मालूम नहीं था। अपने दिवंगत प्रिय डैडी के इस निर्णय से वे पूरी तरह सहमत थे और बहुत खुश भी। संपत्ति का सदुपयोग बहुत जरूरी था और इसके लिए सुधीर के अलावा उपयुक्त पात्र कोई हो भी नहीं सकता।
उधर सुधीर के पिता सेठ दीनदयाल अकेले विचलित एवं बेचैन रहने लगे, पर ऊपर से वे यथावत कठोर बने रहे। घर का नौकर रामू जिसे उन्होंने अकेले में नौकर रख लिया था, उनकी डाँट खा-खाकर तंग आ गया और एक दिन नौकरी छोड़कर भाग गया। एक अकेला बूढ़ा-निरीह माली रह गया था जिसने इसे सेठजी का स्वभाव समझकर व िनयति मानकर स्वीकार कर लिया था। उसने अंत तक सेठजी का साथ निभाया।
अपनी वृद्धावस्था में एक दिन सेठजी संध्या पूजन की तैयारी कर रहे थे कि तभी अचानक 5-6 बदमाश उनके घर का दरवाजा खोलकर अंदर घुस गए। उस समय जाड़े के दिन थे और शाम के केवल 6 बजे थे। उनमें से एक ने कहा- अपना सारा माल हमारे हवाले कर दो। वरना हम तुम्हें मार देंगे। बदमाशों को देख सेठजी माथा पकड़कर बैठ गए। बदमाशों ने सेठजी से अलमारी की चाबी छीन ली। वे सभी नकदी-जेवरात लेकर भाग खड़े थे कि हाथ में कुल्हाड़ी लिए माली सामने आ गया था। एक के सिर में जोर से कुल्हाड़ी का प्रहार किया लेकिन दूसरे ने उस पर रिवॉल्वर दाग दी। मालिक की रक्षा करते-करते रक्षक खुद अपने प्राण गँवा बैठा।
सेठजी मूर्च्छित हो चुके थे। जब उनकी चेतना लौटी तो उनके मस्तिष्क में अतीत के कुछ धुँधले-धुँधले से चित्र उभरने लगे। पत्नी का अपने भाई की शादी में पहनने के लिए सीतारामी हार माँगना और उस पर बिजली की तरह कड़कना। बेचारी कैसी मायूस होकर रह गई थी। सुधीर को बचपन से ही पढ़ने का शौक था, वह कहानियों की रंग-बिरंगी किताबों की ओर आकर्षित होता तो किताबे कम डाँट ज्यादा खा जाता। सुनील का चाबी वाली रेलगाड़ी के लिए जिद करना और गाल पर तड़ से एक तमाचा जड़ देना।
सुधीर का अपने बर्थ डे पर बैटरी वाले स्कूटर का माँगना, दस वर्षीय श्वेता का जींस-टॉप के लिए मचलना, सब उनकी आँखों के सामने चलचित्र की भाँति तैरने लगा। कैसी निर्दयता से अपने बीवी-बच्चों की इच्छाओं को कुचलकर रख दिया था। कभी किसी को प्यार तक नहीं किया। हमेशा घुड़कता ही रहा। आज शायद पहली बार सेठजी को अपने किए पर पछतावा हो रहा था। लेकिन अब क्या हो सकता था। जो बीत गया, उसे वापस नहीं लाया जा सकता। दिल के सदमे ने उन्हें मौत की नींद सुला दिया।
सेठजी के बच्चों को खबर दी गई। वे सब आए। पिता की दुरावस्था पर उन्हें बड़ा तरस आया, किंतु जिम्मेदार भी तो वे ही थे। सब ने मिलकर विधिवत उनका अंतिम संस्कार व अन्य क्रियाकर्म कर दिया। अब केवल मकान और बगीचा शेष बचा था। सुधीर ने वह मकान और बगीचा उस माली के बच्चों के नाम कर दिया जो उसके पिता की रक्षा करते-करते शहीद हो गया था।
कहानी यहीं खत्म होती है। बच्चों क्या तुम बता सकते हो कि यह कहानी चुपके से तुम्हारे कान में क्या कह रही है? |