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बाल कहानी : कर्मगति
ताऊजी शहर के अच्छे वकीलों में से एक थे। उनकी अपनी जिंदगी की गाड़ी आराम से चल रही थी। उन्होंने सुधीर को आगे पढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उन्होंने सुधीर को आई.आई.टी. कानपुर में दाखिला दिया। इस बीच उन्होंने अपने एक घनिष्ठ मित्र राजवल्लभ पंत से सुधीर का परिचय करा दिया, जो एक कंपनी के मालिक थे। मि. पंत स्वयं एक जौहरी थे। हीरे को एक नजर में ही पहचान लिया। मैकेनिकल इंजीनियरिंग में उसकी अच्छी पकड़ को देखकर वे हतप्रभ हो गए। फिर उसकी शिक्षा-दीक्षा का पूरा उत्तरदायित्व उन्होंने अपने हाथों में ‍ले लिया।

चारों तरफ मान-सम्मान और स्नेह-प्यार से घिरे सुधीर को जैसे जन्नत मिल गई। वह बीच में अपने पिता से लुक‍-छिपकर अपनी माँ, बहन और भाइयों से मिलता रहा। उनका दु:ख-दर्द बाँटता रहा तथा अपने भाई-बहन को पढ़ाई जारी रखने के लिए प्रोत्साहित करता रहा।

पढ़ाई पूरी करने के पश्चात सुधीर से मि. पंत ने कहा- तुम्हें कहीं जाने की जरूरत नहीं है। मैं अपने तीन बच्चों को तो विदेश भेज चुका। अब तुम्हें नहीं जाने दूँगा। तुम्हें यहीं रहकर मेरी कंपनी का कार्यभार संभालना होगा। यह मेरा सौभाग्य होगा सर। कहकर उसने उनके चरण छू लिए।

मि. पंत एक भले इंसान थे। अपनी तीनों संतानों को भली-भाँति शिक्षा-दीक्षा और संस्कारों से सुसंस्कृत बनाकर उन्हें उनकी इच्छानुसार अभिलाषित स्थानों पर भेज दिया। लड़की कनाडा जाना चाहती थी, उसे कनाडा भेज दिया। बड़ा लड़का अमेरिका जाना चाहता था, उसे अमेरिका भेज दिया। छोटा लड़का इंग्लैंड जाना चाहता था, उसे इंग्लैंड भेज दिया। तीनों बच्चे उच्च पदस्थ थे। अपने कर्तव्यनिर्वहन में वे पूरी तरह सफल हो सकें, इस बात का उन्हें संतोष था। मिसेज पंत एक विदुषी महिला थीं। पति की उन्नति एवं बच्चों के समुचित पालन-पोषण में उनका विशेष योगदान रहा।

एक दिन सुधीर ने मि. पंत से कहा- 'सर मैं अपनी माँ, बहन एवं भाइयों को भी यहाँ लाना चाहता हूँ।' प्रत्युत्तर में मि. पंत ने पूछा- 'तुम्हारे अन्य भाई-बहन भी हैं।' पश्चाताप एवं रोषभरे स्वर में मि. पंत ने कहा- 'जाओ इसी क्षण उन्हें लेकर आओ।'

सुधीर पहले अपने ताऊजी से मिलने गया और उनसे अपना मंतव्य बताया। ताऊजी ने कहा- 'यदि तुम सबको लेकर आ जाओगे तो तुम्हारे पिताजी का क्या होगा, वे अकेले पड़ जाएँगे।' 'यदि वे आना चाहेंगे तो मैं उन्हें भी ले आऊँगा।' सुधीर ने जवाब दिया। 'तब ठीक है।' कहकर ताऊ चुप हो गए।

सुधीर घर गया। सब कुछ काफी बदल गया था। भाई-बहन सब बड़े हो गए थे। माँ और भी दुबली-पतली हो गई थी। पिता जरूर पहले जैसे ही तेज-तर्रार थे। सुधीर ने कहा- 'मैं सबको लेने आया हूँ।' 'क्या कहा', पिताजी तनकर खड़े हो गए- 'कोई नहीं जाएगा यहाँ से, तुझे जाना था, तू जा चुका, अब वहीं जाकर रह, फिर लौटकर मत आना।' सुनकर सुधीर सन्न रह गया और खाली हाथ वापस चला आया।

दूसरे दिन जब पिताजी दुकान गए तो सब फटाफट तैयार हो गए और माँ को साथ लेकर सुधीर के यहाँ पहुँच गए। उस समय सुधीर नहा रहा था। सर्वेंट ने आकर बताया- 'सर आपके कुछ मेहमान आए हैं।' 'मेहमान! कहाँ से?' नौकर कुछ बोल पाता, इससे पहले ही वह समझ गया और बोला, ' अच्छा ठीक है, उन्हें बिठाओ, मैं आता हूँ।'
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