सेठ को न तो पत्नी से प्यार था और न ही बच्चों से मोह। हर समय सभी को डाँटना-फटकारना एवं चाहे जब पीट देना उसके स्वभाव में था। जब बच्चे पिटते तो माँ का कलेजा फटने लगता, वह बीच में आती तो खुद पिट जाती। माँ एवं बच्चों के बीच एक मूक समझौता था। माँ बच्चों की पीड़ा को समझती थी, बच्चे भी माँ की पीड़ा को समझते थे। विरोध कर पाने की हिम्मत किसी में नहीं थी।
घर का रहन-सहन अतिसाधारण था। बच्चों की शिक्षा-दीक्षा में भी सेठ को कोई खास दिलचस्पी नहीं थी। बड़ा बेटा जब बारह साल का हो गया तो सेठ उसे स्कूल के बाद दुकान पर बिठाने लगा। बारह साल का बच्चा, उसके खाने-खेलने के दिन, कपड़े और गाँठ-गठरी की दुकान में बैठकर क्या करता? वह घर जाने को कहता तो बुरी तरह डाँट खाता या पिट जाता।
कुछ खाने को माँगता तो सेठ कहता- पहले पढ़ लो फिर दिला देंगे, तब तक चाट का ठेले वाला आगे बढ़ जाता। बच्चा कब तक बर्दाश्त करता, आखिर एक दिन घर छोड़कर भाग गया। माँ रो-रोकर आधी हो गई। अन्य बच्चे माँ के और करीब आ गए। सेठ को कोई धक्का नहीं लगा। बोला- 'जाएगा कहाँ एक दिन लौटकर आएगा ही', पर वह कभी लौटकर नहीं आया। फिर भी सेठ की क्रूरता एवं कृपणता में कहीं कोई कमी नहीं आई।
दो-चार दिन इधर-उधर भटकने के पश्चात बच्चा अपने ताऊजी के यहाँ पहुँच गया। वह काफी सहमा हुआ था, अत: उस दिन उससे किसी ने न कुछ पूछा और न कुछ कहा। उसके पिता के कठोर व्यवहार से सब परिचित थे।
हफ्ते-दस दिन बाद अपने ताऊ के स्निग्ध और रहमदिल स्नेह से उसके अंदर का दु:ख-दर्द स्वयं ही पिघलकर बाहर आ गया। माँ एवं भाई-बहनों पर क्या गुजर रही थी, उसने सबकुछ बता दिया। चिंतित मुद्रा में सभी एक लंबी साँस भरकर रह गए। कर भी क्या सकते थे? सबसे छोटा होने के कारण वह सभी का स्नेहभाजन बन गया।
ताऊजी को तीन संतानें थीं। दो लड़कियाँ और एक लड़का। दोनों लड़कियाँ बड़ी थीं और लड़का छोटा था। लड़के को चचेरे भाई के रूप में एक साथी मिल गया। ताईजी सहित सभी खुशमिजाज थे। लड़का सबमें खूब घुल-मिल गया, लेकिन वह अपने छोटे भाई-बहनों को भूला नहीं।
ताऊजी ने सुधीर का स्कूल में एडमिशन करा दिया। सुधीर मेधावी था। इंटरमीडिएट में उसने जिले में सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया। ताऊजी सहित घर के सभी सदस्य फूले नहीं समाए। सभी गर्व से पुलकित हो उठे। सभी ने उसका माथा चूम लिया। सुधीर की आँखों में स्नेह के अश्रु छलछला आए। उसे अपनी माँ याद आ गई। |