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रस्‍साकसी
तीन-चार दिन ही बीते होंगे कि रामी पुन: पूर्ववत अपने समय पर उपस्‍थित हो गई। मैंने पूछा ‘तुम्‍हारी प्रिंसपलनी कि तबियत ठीक हो गई क्‍या ?’ मेरा इतना कहना था कि उसको मानो अपने मन की भड़ास निकालने का अवसर मिल गया हो, टेढ़ा मुँह बनाकर बोली, ‘अरे कल की मरती आज मरे, हमें का करै का ह’ और फिर अविरल प्रवाह में उनके लिए अपशब्‍दों की बौछार प्रारंभ कर दी। उसके इस प्रहार से मिसेज चंदानी का तो पता नहीं पर मेरा तन अवश्‍य आहत हो गया। मैंने लगभग उसे डाँटते हुए कहा ‘क्‍या अनाप-शनाप बोले जा रही है।

कल तक तो उनकी इतनी सेवा करती थी और आज उस दु:खी आत्‍मा को कोस कर क्‍यों पाप की भागी बन रही है’ अरे दीदी आपको पता नहीं बुढ़िया बड़ी घाघ है, अरे हम का नहीं कियै ओह के बरै ? ू-मूत तक साफ कियै, तेल लगावा, दलिया बनावा पर ऊ नासुक्री बुढ़िया हमका तो टका नाही दिहिस’ फिर पास आकर धीमे स्‍वर में बोली दीदी तोहका पता है बगल वाले चौबेजी मीठी-मीठी बतिया बनाय के बुढ़िया के मकान अपनै नाम कराय लिहिन’ मुझे सारी कहानी वर्षा के बाद धुले आकाश के समान स्‍पष्‍ट दिखने लगी, मैं समझ गई कि जिसे मैं रोमी की भलमनसाहत समझ रही थी वह कुछ पाने का स्‍वार्थ था। पर मुझे रोमी की बात का विश्‍वास नहीं हुआ।

चौबे परिवार तो मिसेज चंदानी की सर्वाधिक बुराई करता था फिर वह पढ़ी-लिखी महिला अपना सब कुछ उन्‍हें क्‍यों देगी। पर फिर और लोगों से भी ज्ञात हुआ कि आज कल चौबेजी का पूरा घर दिन-रात उन्‍हें घेरे रहता है और उनकी सेवा में जुटा है, उनका बेकार बेटा जिसने दादी की अंतिम इच्छा पूर्ण करने के लिए बिना कमाई के ही विवाह कर लिया था, अपनी पत्‍नी सहित मिसेज चंदानी के घर पर ही डेरा डाले हुए है। रामी की तो उन्‍होंने एक प्रकार से छुट्टी ही कर दी है। बस बर्तन साफ करवाकर उसे चलता कर देती हैं। वह तो रामी ने किसी समय काम के बहाने से उनके मध्‍य होने वाले वार्तालाप से इस रहस्‍य को जान लिया। संभवत: मिसेज चंदानी ने इस असहाय अवस्‍था में डूबते में तिनके का सहारा पाकर यह निर्णय लिया होगा अथवा लेने को विवश हुई होंगी।

दो-तीन दिनों ही में नाटक में नया मोड़ आ गया। मैं सोकर उठी ही थी कि बाहर से लोगों की जोर-जोर से बहस करने की ध्‍वनि सुनकर मैं बाहर आ गई। वहाँ देखा कि मिसेज चंदानी के घर के सामने एक कार खड़ी है और एक सूटेड-बूटेड सज्‍जन चौबेजी से कह रहे हैं, ‘आप कौन होते हैं, मेरी मदर के बारे में कुछ तय करने वाले, पता नहीं इन्‍हें कौन-सी दवा देकर बीमार कर दिया- उनका इलाज मैं किसी अस्‍पताल में कराऊँगा’ चौबेजी का तो पूरा परिवार ताल ठोंक कर लड़ने की मुद्रा में खड़ा था।

उनकी पत्‍नी हाथ नचाकर बोली- ‘रहने दो बड़े आए माँ की चिंता करने वाले, सालों तो इधर झाँका नहीं, अब आखिर समय में जब मकान पर हक की बात आई तो चले आए लाड़ले बेटा बनकर’ वह सज्‍जन क्रोध से लाल-पीले हुए जा रहे थे। जब उनका चौबेजी की पत्‍नी के आगे वश न चला तो अपनी आंग्‍ल भाषा का प्रभाव डालने का प्रयास करते हुए चौबेजी से बोले ‘प्‍लीज आस्‍क यूअर वाइफ टु बिहेव हरसेल्‍फ’ इस पर चौबेजी पत्‍नी बोलीं- ‘बस-बस जादा अंग्रेजी में न टरटीराओ, खबरदार जो अम्‍माजी को यहाँ से ले गए

मैं विस्‍मय विमूढ़ थी, तो क्‍या इनका बेटा भी है- फिर यह यहाँ अकेली क्‍यों रहती हैं। इतने दिनों से बीमार हैं और बेटा आज आया। मैं अपनी संवाददाता रामी की प्रतीक्षा करने लगी। मेरी इस रहस्‍यमय प्रकरण में रुचि बढ़ती जा रही थी। तभी रामी आ गई। घटना के इस नाटकीय मोड़ से वह अति उत्‍साहित थी, वह प्रसन्‍न होकर बोली ‘देखा दीदी, चौबे की सारी चालाकी धरी रह गई’ मैंने कहा ‘पर आज तक तो इनका बेटा दिखा नहीं
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