: अनिता चौहान
'तेजेन्द्र शर्मा ने मित्रता निभाने की कोई सीमाएँ नहीं बना रखीं। किसी की भी सहायता करते समय वे कोई हद मुक़र्रर नहीं करते। उनके द्वारा रचे साहित्य की सबसे बड़ी ख़ूबी यही है कि उसके विषय यहाँ ब्रिटेन की ज़मीन से जुड़े हैं। उनकी कहानियाँ, कविताएँ, ग़ज़लें ब्रिटेन की ज़िन्दगी से हमारा परिचय करवाती हैं।'
ये उद्गार व्यक्त किए भारतीय उच्चायोग की मंत्री व संस्कृति एवं नेहरू केन्द्र की निदेशिका श्रीमती मोनिका मोहता ने। अवसर था एशियन कम्यूनिटी आर्ट्स द्वारा आयोजित कार्यक्रम सृजनात्मकता के तीन दशक जिसमें कथाकार, कवि एवं ग़ज़लकार तेजेन्द्र शर्मा के व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की गई।
मोनिका मोहता ने तेजेन्द्र शर्मा को नेहरू केन्द्र का मित्र और उनके अपने परिवार का सदस्य बताते हुए अपने कवि पति मधुप मोहता द्वारा विशेष तौर पर तेजेन्द्र के व्यक्तित्व पर लिखी गईं चार पंक्तियों के माध्यम से तेजेन्द्र शर्मा का परिचय कुछ यूँ दिया- इक दिया तूफ़ान में जलता रहा / इक शजर सहरा में भी खिलता रहा / वो कहानी की रवानी है ग़ज़ल की गूँज भी / इक कलम का कारवाँ, चलता रहा। कार्यक्रम अपने घोषित समय पर शुरू हो गया तो खचाखच भरे हॉल के दर्शकों को हैरानी हुई। वे सोचने लगे कि अब कार्यक्रम समाप्त भी समय पर ही हो जाएगा, किन्तु ऐसा हुआ नहीं। प्रत्येक वक्ता ने अपने निर्धारित समय से बहुत अधिक समय लिया और जमकर तेजेन्द्र के व्यक्तित्व को श्रोताओं के साथ बाँटा। | | 'तेजेन्द्र शर्मा ने मित्रता निभाने की कोई सीमाएँ नहीं बना रखीं। उनके द्वारा रचे साहित्य की सबसे बड़ी ख़ूबी यही है कि उसके विषय यहाँ ब्रिटेन की ज़मीन से जुड़े हैं। उनकी कहानियाँ, कविताएँ ब्रिटेन की ज़िन्दगी से हमारा परिचय करवाती हैं।' |
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कार्यक्रम की शुरुआत में एशियन कम्यूनिटी आर्ट्स की अध्यक्ष काउंसलर ज़कीया ज़ुबैरी ने सभी गणमान्य अतिथियों का स्वागत करते हुए बताया कि उनकी संस्था कथा यू.के. के साथ मिलकर हिन्दी और उर्दू के बीच की दूरियाँ पाटने के प्रयास कर रही है। वे साहित्य एवं संस्कृति के माध्यम से दो मुल्कों के नागरिकों के दिलों की दूरियों को दूर करने में विश्वास करती हैं। तेजेन्द्र शर्मा को एक चलती-फिरती संस्था का नाम देते हुए उन्होंने तेजेन्द्र की दूसरों की सहायता करने की प्रकृति की सराहना की। तेजेन्द्र की कहानियाँ उन्हें आधुनिक कहानी का सर्वोत्तम उदाहरण लगती हैं।
वेल्स के डॉ. निखिल कौशिक ने तेजेन्द्र की ग़ज़ल ये घर तुम्हारा है... (गायिका- मीतल पटेल, संगीत - अर्पण) और साथ ही तेजेन्द्र का एक साक्षात्कार भी पर्दे पर दिखाया। बाद में अपने पॉवर-पाइण्ट प्रेजेन्टेशन के माध्यम से डॉ. कौशिक ने इस बात पर जोर दिया कि तेजेन्द्र परिवार के मूल्यों के प्रति कटिबद्ध हैं। वे अपने रिश्ते पूरी शिद्दत से निभाते हैं और फिर वसुदैव कुटुम्बकम के आधार पर अपने परिवार का विस्तार भी करते हैं। उन जैसे कई मित्र तेजेन्द्र के विस्तृत परिवार का हिस्सा है।
बी.बी.सी. हिन्दी विभाग के पूर्व अध्यक्ष श्री कैलाश बुधवार ने तेजेन्द्र पर अपनी बात कुछ यूँ कही, 'तेजेन्द्र की जिस ख़ूबी का मैं सबसे ज़्यादा क़ायल हूँ, वो यह कि वे वन-मैन एन्टरप्राइस हैं। जो भी किया है अकेले दम, सिंगल-हैण्डिड। उनके पीछे कोई गॉडफ़ादर, कोई प्रोमोटर नहीं, कोई गुट नहीं जिसका उन्हें सहारा हो। जब इस मुल्क में आए थे, तो किसी को नहीं जानते थे। सिर पर हाथ रखने वाला कोई नहीं था। मगर आज अंतरराष्ट्रीय इन्दु शर्मा कथा सम्मान की जो धूम है, उसके नाते जो भी लेखक या संपादक भारत से लन्दन आता है, उनसे मिलना चाहता है।'
भारतीय उच्चायोग के हिन्दी एवं संस्कृति अधिकारी श्री राकेश दुबे ने तेजेन्द्र शर्मा के साथ अपनी निजी मित्रता की बात करते हुए अपनी विशिष्ट शैली में कहा, 'काला सागर' की गहराई से शुरू किया जो कहानी लेखन का सफ़र तो फिर रुके नहीं, अपनी लेखनी की 'ढिबरी टाइट' करते हुए लिखते रहे, नौकरी भी करते रहे, घर भी चलाते रहे। साहित्य साधना में ऐसे जुटे कि अपनी 'देह की कीमत' न जानी। फिर मुम्बई के 'ईंटों के जंगल' से निकलकर महारानी विक्टोरिया के देश में आ बसे।
बीबीसी पर उनकी धमक सुनाई पड़ी; जीवन की गाड़ी भी धीरे-धीरे पटरी पर दौड़ने लगी। लेकिन वे शांत कहाँ बैठने वाले थे; कहने लगे लोगों से कि अपने 'पासपोर्ट का रंग' न देखो, जहाँ रह रहे हो वहाँ की बात सुनो, समझो, कहो क्योंकि 'ये घर तुम्हारा है'। तेजेन्द्रजी की नज़र भविष्य पर है, कदम ज़मीन पर और सोच गंगा-जमुनी संस्कृति की पोषक। वे यह दुआ करते रहे हैं कि उनकी रचनाओं के संदेश की 'बेघर आँखें' हर रचनाकार की आँखें बन जाएँ और परस्पर मेल-मिलाप की भावना से हम साथ-साथ आगे बढ़ें।
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