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लंदन में मोम के बाशिंदे!
- निर्मला भुराड़िया
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इस म्यूजियम में पहुँचकर आप आश्चर्यचकित रह जाते हैं। पुतलों को देखकर आपको धोखा हो जाता है कि कहीं आप सचमुच के व्यक्ति को ही तो नहीं देख रहे हैं? मोम के ये पुतले सजीवता के इतने करीब हैं कि बस लगता है प्राण प्रतिष्ठा की देरी है और ये बोलने लगेंगे।

लंदन एक शानदार शहर है। ऊर्जा से भरपूर, कलाओं का कद्रदान। लंदन पहुँचकर आप उसकी जगमग में खो जाते हैं। पर्यटकों को रमाने वाले एक से बढ़कर एक दर्शनीय स्थल भी लंदन में हैं। इन्हीं में एक आकर्षण का केंद्र है मैडम तुसाद वेक्स म्यूजियम।

इन दिनों भारतीय मीडिया में भी यह म्यूजियम चर्चा में बना हुआ है। क्योंकि पिछले दिनों बॉलीवुड के कई फिल्मी सितारों के मोम से बने पुतले इस म्यूजियम में रखे गए हैं। अमिताभ बच्चन, शाहरुख खान, सलमान खान, ऐश्वर्या राय अपनी 'मोमीय अदा' यहाँ बिखेर रहे हैं तो इंदिरा गाँधी, राजीव गाँधी कीमोम से बनी मूर्तियाँ भी इस म्यूजियम में हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध लोगों में मार्गरेट थैचर से बिल क्लिंटन तक की हस्तियाँ मोम के रूप में जमकर यहाँ विराजमान हैं।
  इन दिनों भारतीय मीडिया में भी यह म्यूजियम चर्चा में बना हुआ है। क्योंकि पिछले दिनों बॉलीवुड के कई फिल्मी सितारों के मोम से बने पुतले इस म्यूजियम में रखे गए हैं। अमिताभ बच्चन, शाहरुख खान, सलमान खान, ऐश्वर्या राय अपनी 'मोमीय अदा' यहाँ बिखेर रहे हैं।      


इस म्यूजियम में पहुँचकर आप आश्चर्यचकित रह जाते हैं। पुतलों को देखकर आपको धोखा हो जाता है कि कहीं आप सचमुच के व्यक्ति को ही तो नहीं देख रहे हैं? मोम के ये पुतले सजीवता के इतने करीब हैं कि बस लगता है प्राण प्रतिष्ठा की देरी है और ये बोलने लगेंगे। इनके रंग-रूप, कृत्रिम माँस मज्जा, केशसज्जा वास्तविकता के इतने करीब हैं कि आप हतप्रभ हो जाते हैं और जानना चाहते हैं कि आखिर ये कौन कलाकार हो सकता है जो उत्कृष्टता की इतनी ऊँची पायदान पर पहुँच सकता है?

कला की इस विधा की जनक थीं मैडम तुसाद जिनके नाम पर ही इस म्यूजियम का नामकरण किया गया है। 1761 में स्ट्रासबर्ग में पैदा हुई मेरी ग्रोशॅल्ट्ज का बचपन बर्न और फिर पेरिस में बीता, जहाँ वह अपने मामा फिलिप करटिस के साथ काम करती थीं, जो कि वेक्स मॉडलिंगकरते थे। मामा की मृत्यु के बाद भी मेरी ने अपना कार्य जारी रखा बल्कि उसे निखारा और उसमें नए प्रयोग जोड़े।

वह जीनियस साबित हुई और फ्रांस के लुई सोलहवें की बहन एलिजाबेथ को कलाकर्म सिखाने लगीं। दुर्भाग्य से बीच में राज्य क्रांति हुई और मेरी को कैद कर लिया गया। यह कोरी-मोरी कैदी ही नहीं थी, उसे एक जघन्य कर्तव्य में लगा दिया गया। यह था गुलेटिन (एक तरह का सिर काटने वाला तख्ता) में काटे गए द्रोहियों के सिरों को लेकर उनके मोम के मुखौटे बनाना। ये डेथ मास्क कहलाते थे इसके लिए मेरी को ताजे कटे सिर भेजे जाते थे जिनमें से कई तो उसके परिचितों और दोस्तों के ही होते थे।
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