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जी हाँ, मैं हूँ मिस्टर चिटचोर
व्यंग्य
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अपनी सफलता पर हम मुस्कराना ही चाहते थे कि अपनी गलती का हमें एहसास हो गया। पूछे गए प्रश्न व लिखे गए उत्तर में खेत-खलिहान का संबंध भी न था। अब हमें केवल तीसरी चिट का भरोसा था। उसे निकालकर हम प्रश्न पत्र के बीच सुरक्षित रखना ही चाह रहे थे कि पुनः पर्यवेक्षकजी की खोजी नजरों का शिकार बन गए। अबकी बार उन्होंने चिट तो हमारे हाथ में थमा दी किन्तु उत्तरपुस्तिका छीनकर हमें परीक्षा भवन से बाहर का रास्ता बता दिया।

हम बुझे मन व थके कदमों से घर आ गए। बहुत दुःख हुआ वह चोर ही क्या जो चोरी करते रंगे हाथों पकड़ा जाए। वह दूधवाला ही क्या जो पानी मिलाते पकड़ा जाए। ऐसा तो नाबालिग-नौसिखिए के साथ भी कभी-कभी होता है, हम तो इस खेल के मँजे हुए खिलाड़ी माने जाते हैं कैसे रन आउट हो गए पता ही न चला।

मातम मानने का न तो सवाल ही था न समय, अतः अगले पेपर की तैयारी शुरू कर दी। नकल करने का नया तरीका ईजाद करना था। एक पैकेट सिगरेट एवं तीन कप चार की चुस्कियाँ लेने पर चमत्कारिक रूप से एक उपाय खल-खोपड़ी में कौंध गया। बाजार से तीन नए पेन खरीदे, उनकी निब निकालकर कूड़ेदानी में फेंक दी तथा स्याही भरने की जगह जितनी चिट समा सकती थीं उतनी भर दीं।

अगले दिन पाँच पेन का काफिला लेकर हम परीक्षा कक्ष में पहुँच गए। प्रश्न-पत्र देखकर हमने अनुमान लगा लिया कि पेन की अंतर-आत्माओं में छिपा ज्ञान लगभग पूर्णता को प्राप्त कर रहा था। पर्यवेक्षक महोदय की सजगता से हमारा साहस साथ छोड़ता सा जा रहा था। जैसे-तैसे साहस बटोरकर अपने भूले-बिसरे इष्ट देवी-देवताओं का स्मरण कर नकल का महान अभियान प्रारंभ कर दिया।

हमारा नकल अभियान निर्विघ्न व सुचारु रूप से चल रहा था किन्तु किस्मत को हमसे रूठना ही था सो रूठ गई। पर्यवेक्षकजी को कुछ कागजों पर हस्ताक्षर करने की आवश्यकता आन पड़ी।

खुद की कलम रखना उनकी मर्यादा के खिलाफ था और किसी की पेन लेकर वापिस न करना उनका स्वभाव। उनकी लोलुपी दृष्टि हमारे जेब की शोभा बढ़ा रहे नवीन पेन पर टिक गई। जब तक हम सोचते-समझते निब रहित नई कलम उनके हाथों में पहुँच चुकी थी। नई कलम पाकर वे गदगद् हुए जा रहे थे और हम पसीने-पसीने। पेन का ढक्कन खुलते ही हमारी काली करतूतें किसी भुतहा महल में वास कर रहीं चमगादड़ों की भाँति पंख फड़फड़ाने लगीं। निब रहित नई कलम देखकर शंकालु पर्यवेक्षकजी को दाल में काला नजर आने लगा। पेन छिड़ककर स्याही की जाँच करनी चाही, स्याही थी ही नहीं निकलती कहाँ से? उनका संदेह विश्वास में बदल गया। अगले ही पल हमारी सारी चिट टेबिल पर पड़ी-पड़ी हमको ही चिढ़ा रही थीं। निरीक्षक महोदय अपनी इस अप्रत्याशित सफलता से प्रसन्नचित्त थे।

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उन्होंने बाकी पेन की सारी चिट भी निकालकर हमारी टेबल पर रख दीं और पेन अपनी जेब में सुरक्षित रख लिए। उनकी ऊँची आवाज सुनकर केन्द्राध्यक्ष महोदय भी कक्ष में आ गए। हम मुँह दिखाने के लायक तो नहीं रह गए थे, फिर भी क्षमा प्राप्ति की आशा में याचक दृष्टि से कभी-कभी उनका मुँह ताक लेते थे। अपने साथियों की नजरों में भी हम गिर चुके थे। एक मछली ने सारे तालाब को गंदा कर दिया था। तलाशी अभियान की आशंका से अनेक चेहरे बदरंग हो रहे थे। केन्द्राध्यक्ष महोदय ने हमारी पिछले तीन वर्षों की रिकार्ड तोड़ असफलता से इस वर्ष का पूर्वानुमान लगाकर हमें हमारे हाल पर छोड़ दिया। उनका यह व्यवहार हमारी आत्मा को कचोट गया। नौ सौ चूहे हजम कर बिल्ली खाला हज की तैयारी करने लगी, अपने किए की सजा हम स्वयं को देने पर उतारू हो गए।

शेष सारे पर्चे हमने बिना नकल के, बिना अकल के पूरे किए हैं। जानते हैं इसका प्रतिफल अच्छा नहीं मिलेगा, परीक्षाफल पूर्व वर्षों की तरह खट्टा या कड़वा ही रहेगा। उत्तीर्ण होने की आशा तो दूर की बात पूरक आने की संभावना भी नहीं है। बस उम्मीद है तो एक ही कि सरकार द्वारा हम जैसे लोगों के वोट पाने के लिए अगली कक्षा में प्रमोशन दे दिया जाए तो कदाचित हमारा भी उद्धार हो जाए। पर बिल्ली के भाग्य से छींका टूटे तब न....!
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