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जी हाँ, मैं हूँ मिस्टर चिटचोर
व्यंग्य
-राजेन्द्र श्रीवास्त
मिस्टर चिटचोर
NDND
मैं बेहिचक स्वीकार करता हूँ कि मैं चिटचोर हूँ। आप चाहें तो मुझे नकलची भी कह सकते हैं। वास्तविकता को छुपाना या नकारना मेरी आदतों में शुमार नहीं है। इसमें लज्जा या ग्लानि जैसी कोई बात भी नहीं है कि हम डूब मरने के लिए चुल्लू भर पानी ढूँढते रहें। इस छोटी-सी उम्र में ऐसी छोटी-मोटी चोरियाँ, चोरी नहीं कहलातीं। हमने चिटचोरी की है, बोफोर्स या चारा या यूरिया... आदि न खाया न चुराया।

दरअसल इस उपाधि को धारण करने का भी कारण है। अकल नाम की चिड़िया ने भूलकर भी हमारी खोपड़ी में घोंसला बनाना तो दूर की बात, कभी इस ओर पंख भी नहीं फड़फड़ाए। इस चिड़िया को फँसाने की, रिझाने की हमारी सभी कोशिशें नाकाम साबित हुईं। पिश्ता-बादाम का हलुवा खाया, सुबह उठकर ठंडे पानी से लगातार चार दिन नहाया पर ढाक के तीन पात से चौथा नहीं हुआ। मजबूरन अपने आगे-पीछे, दाएँ-बाएँ काक-दृष्टि से साथियों की कॉपी में जो लिखा दिखता उसे अक्षरशः अपनी कॉपी में उतार लेते। न प्रश्न क्रमांक की चिन्ता न सही-गलत की जाँच। अब यह बहुत पुरानी बात हो गई। इस बीच कई कुर्सियाँ-उलट-पलट हो गईं। कितने ही जंगल व जंगली जानवर जल की तरह भाप बनकर केवल जुबान पर रह गए।

मिस्टर चिटचोर
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विगत तीन वर्षों की असफलता को भुलाकर अंतिम अवसर वाली इस बोर्ड परीक्षा में शामिल हुए थे। ताक-झाँक से पड़ोसियों के घर की खबर भले मिल जाए परीक्षा में सफलता नहीं मिल सकती। पहले दिन पुराने ढर्रे पर चलते हुए हमने हथेली व सफेद शर्ट पर रामायण लिख ली, पर वाह री किस्मत, हाय रे दुर्भाग्य प्रश्न-पत्र बनाने वालों ने महाभारत पूछ ली। जीवन में फिर एक बार गैस पेपर्स व आई.एम.पी. बताने वाले शिक्षकों दोनों पर से, लुटे-पिटे मतदाता के समान, विश्वास उठ गया।

परीक्षा कक्ष में वे तीन घंटे हमने कैसे बिताए, हम ही समझ सकते हैं अथवा हमारा 'हम-पेशा' साथी। मेरे चारों तरफ सभी की कलम चल रही थी, केवल हमारी आत्मा मचल रही थी। अपने तथाकथित ज्ञान का परिचय देना आवश्यक था। अतः प्रश्न-पत्र की ही सत्य प्रतिलिपि पूर्ण विराम सहित उत्तरपुस्तिका पर उतार दी और संतोष की एक लंबी साँस लेकर बाहर आ गए। बिल्कुल उसी विजयी मुद्रा में जिस मुद्रा में कोई आत्मसंतुष्ट सांसद चिल्ल-पौं मचाकर या कुर्सियाँ-माइक आदि पटककर बाहर आता है और अपनी अशिष्टता को टी.वी. के प्रवक्ता को शिष्टतापूर्वक बयान कर जाता है।

घर आकर अगले पेपर की तैयारी शुरू कर दी। यहाँ-वहाँ से लाई गई चुराई गई पुस्तकों की धूल झाड़कर, खास-खास पृष्ठों को फाड़कर शर्ट की कॉलर व पेन्ट की तुरपाई में छिपा लिया और घोड़े बेचकर सो गए। परीक्षा कक्ष की औपचारिक चैकिंग में हम बच गए। उचित समय पर हमने नकल अभियान प्रारंभ कर दिया किन्तु भाग्य का खेल देखिए- कुछ ही लाइन लिख पाए थे कि पर दोषायः सहस्त्र नयनेः पर्यवेक्षकजी ने हमारी चोरी पकड़ ली। उन्होंने अपनी दयालुता दर्शाते हुए हमसे हमारी चिट छीन ली, चेतावनी देने का कर्तव्य पूर्ण कर उदासीन भाव से आगे बढ़ गए। उनकी सदाशयता का लाभ उठाकर हमने दूसरी चिट का भरपूर लाभ उठा लिया।
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