| | अगले दौर में दूसरी संस्थाओं से मोहब्बत बढ़ती है। आदर्श सहकारिता के तहत तू मेरे को तोक, मैं तेरे को तोकूँ जैसी स्थिति बनती है। वो इन्हें अध्यक्ष बनाते हैं, ये उन्हें मुख्य अतिथि बनाते हैं। |
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सहकारिता जब गर्भवती होती है, तो साहित्यिक गुटों और खेमों को जन्म देती है। इन खेमों का सरगना साहित्यकार होता है। साहित्य की ये गेंगें या खेमे एक-दूसरे पर परोक्ष हमले किया करती हैं। इन हमलों में सहकारिता की चरम सीमा देखने को मिलती है। एक गेंग दूसरे गेंग की काट करती है। एक सरगना दूसरे सरगने को घोंचू बताता है। यहाँ तक कि एक-दूसरे की उपाधियों, सम्मानों और पुरस्कारों पर उँगलियाँ उठती हैं। उन्हें प्रायोजित कबाड़ा हुआ बताया जाता है। जुबानी बमबारी में रचना चोरी करने तक के आरोप-प्रत्यारोप पीठ पीछे तक लगते हैं। मैं चला था जानिबे मंजिल अकेला ही मगर, लोग मिलते गए, कारवाँ बनता गया की तर्ज पर साहित्यकार मिलते जाते हैं और संस्था की कार्यकारिणी गठित हो जाती है। मार्गदर्शकों तथा संरक्षकों के रूप में कुछ बुढ़ाए हुए, कुछ छुटे हुए साहित्यकार तथा नेताओं को ले लिया जाता है। न...न... करते हुए भी ये लोग संरक्षण और मार्गदर्शन का बोझ अपने कंधों पर ले ही लेते हैं। खैर फिर, कुछ समय तक तो बाकायदा गोष्ठियाँ होती हैं जिनमें रचनापाठ होता है। इस दौर में सहकारिता की भूमिका एक-दूसरे की रचनाओं की तारीफ तथा परस्पर सहयोग से चाय-पानी और प्रेस नोट लिखना, टाइप करवाना, बँटवाने तक सीमित रहती है। अगले दौर में दूसरी संस्थाओं से मोहब्बत बढ़ती है। आदर्श सहकारिता के तहत तू मेरे को तोक, मैं तेरे को तोकूँ जैसी स्थिति बनती है। वो इन्हें अध्यक्ष बनाते हैं, ये उन्हें मुख्य अतिथि बनाते हैं। कार्यक्रम में एक-दूसरे की प्रशंसा 'अहो रूपो अहो ध्वनि' वाले अंदाज में की जाती है। सहकारिता का यह दौर आगे बढ़ता है तो अभिनंदन, सम्मान और षष्टिपूर्ति तक जा पहुँचता है। इस पूरी अवधि में वे लोग जाने कहाँ छूट जाते हैं, जो संस्था के लिए भागा-दौड़ी करते थे। अब सहकारिता अवसरवादियों के हाथों में चली जाती है। वे सब मिलजुलकर नींव के पत्थरों को ठेंगा दिखाते हुए एक तरफ कर देते हैं। नींव के पत्थर सोचा करते हैं कि हमारे साथ तो यह हुआ 'वक्त पड़ा तो खून हमने दिया, बहार आई तो कहते हैं तेरा काम नहीं।' अवसरवादी एकजुट हो जाते हैं और वे साहित्य की सहकारिता करने लगते हैं। मंच पर वे। माइक पर वे। कैमरे की जद में वे। अतिथियों के आगे-पीछे वे। इस दौरान वे इतनी गुटबाजी कर लेते हैं कि भविष्य में लाभ लिया जा सके। |