मनोज पांचाल मंदी के इस दौर में दुकान पर ग्राहक का आना एक अद्भुत घटना हो गई है। दुकानदार दुकान में तरह-तरह का सामान सजाकर बैठे हैं। नाना प्रकार के प्रलोभन लटकाए बैठे हैं, पर ग्राहक हैं कि नहीं आ रहे। काश! ग्राहक गमले में उगते होते या पेड़ों पर लगते होते। दुकानदार जब सुबह दुकान खोलते हैं तो भगवान की पूजा में मन नहीं लगता। पूजा की घंटी बजाते-बजाते हर राहगीर को ताकते हैं। क्या पता किस भेष में ग्राहक मिल जाए। ऐसे में अगर कोई भाव भी पूछने चला आए तो मन को बड़ा सुकून मिलता है। लगता है ग्राहक चीजों को करीब से छूना चाहता है, पाना चाहता है, लेकिन सिर्फ दूर से देखकर आहें भरकर लौट रहा है। दरअसल, ग्राहक फिलहाल ग्राहक छोड़कर सब कुछ बना हुआ है। वह लाख कोशिश करने पर भी ग्राहक नहीं बन पा रहा है। उसे याद आता है वह हसीन दौर, जब अपनी पत्नी समेत बाजार जाता था और मनपसंद चीजें सवा गुनी ले आता था। नकद खरीदी के बाद भी उसका मन हल्का रहता था। वह साथ में चाट-पकौड़े भी घर ले आता था। घर पर प्रतीक्षा में बैठे मम्मी-डैडी के साथ बड़े इतराकर यह चाट खाते थे। अब महँगाई की मार बच्चू को ऐसी लगी कि उठ नहीं पा रहा है। घर में रहकर सपने बुनता रहता है कि यह लाना है, वह लाना है, लेकिन फिलहाल वह सब्जी भी बमुश्किल ला पा रहा है। सब्जी लेने निकलता है तो मन में पहले ही शंका घर कर जाती है कि 'चतरा' धनिया फ्री देगा या नहीं। असल में पिछले दिनों में वह बाजार में बड़ा ग्राहक देवता बना फिरता था। तब उधारी में हाथी ला-लाकर घर में बाँध लिए। साथ में हर सौदे में कुछ न कुछ फ्री पाने की आदत पड़ गई, पर अब उन हाथियों की किस्त चुकाने में पसीना आ रहा है। नया कुछ भी खरीदने की हिम्मत नहीं हो पा रही है। अब तो वह सब्जी वाले के यहाँ भी जाता है तो बड़ी सतर्कता से काम लेता है। गिलकी के भाव पूछते वक्त निगाह करेले पर भी रखता है। उसे मालूम है चार दिन से गिलकी के भाव चढ़े हुए थे। सो आज कौन से कम हो गए होंगे। लिहाजा आज भी करेले पर ही 'लॉक' करना पड़ सकता है। कभी भाग्य से गिलकी के भाव कम हो गए होंगे तो आज सप्ताह भर की खरीदी की जा सकती है, लेकिन तभी मालूम पड़ता है कि श्रीमतीजी ने प्याज अनिवार्य बताए थे और चूँकि प्याज का भाव आसमान पर है अतः गिलकी आज फिर 'कैंसल' हो जाती है। कभी दया दिखाकर सब्जी वाला धनिया फ्री देने लगता है तो वह सोचता है, काश! धनिए की ही सब्जी बन जाती! ऐसे में दुकानदार यह उम्मीद लगाए बैठा है कि यह सब्जी खाते ही ग्राहक देवता दूसरा बड़ा झोला लेकर बड़ी खरीदी पर निकल पड़ेगा, पर उसे नहीं मालूम कि इस झोले में कितने छेद हो गए हैं। सबसे बड़ा छेद उधारी की किस्तों ने कर रखा है। फिर बच्चों की स्कूल फीस, पेट्रोल बजट, इनकम टैक्स, सेविंग, बीमा जैसे कई छोटे छेद भी हैं, जिन पर पैबंद लगाते-लगाते ही पूरी इनकम आएँ-बाएँ हो जाती है। अब भला वह घर से निकले तो निकले कैसे। आप उसको वॉशिंग मशीन के साथ इलेक्ट्रिक प्रेस फ्री देकर उसके ऐश्वर्य में वृद्धि करने का पुण्य करना चाह रहे हैं। वह स्वयं किसी पंडाल में बैठकर किसी महाराज से इस नाशवान शरीर पर गर्व न करने का पाठ पढ़ रहा है। कपड़े की नहीं, उसे मन का मैल धोने की शिक्षा अच्छी लगने लगी है और विद्युत इस्त्री उसे पसंद नहीं आ रही, क्योंकि जिस भी शब्द में स्त्री शामिल होती है, हर उस शब्द में उसे 'एक्स्ट्रा' खर्च का करंट लगने लगा है। उसे पता चल गया है कि आय से अधिक खर्च करने वाला अज्ञानी होता है। वह कष्ट सहता और दुख भोगता है। अब उसका सारा ध्यान अपनी आय पर है। सुकून के इस पांडाल में वह आय को 'हाय' से अलग करना सीख रहा है। कह नहीं सकते बाजार को वह कितना इंतजार करवाएगा। |