कृष्णमोहन मिश्रा लीजिए साहब बरसात आ गई । अब की बार वक्त पर आ गई । अखबार वाले कह रहे थे कि पिछली बार भी वक्त पर आई थी । आनी भी चाहिए अगर सर्दी, बसंत और गर्मी, ठीक वक्त पर आ सकती है तो बरसात को भी टाईम का पाबंद होना चाहिए। पाबंदी जरूरी है ।
हमारे बॉस का भी यही कहना है कि हर काम टाइम पर होना चाहिए, हालाँकि प्रातः स्मरणीय श्री बॉस को दशकों हो गये प्रातः काल में बिस्तर छोड़े हुए । छोड़िये उनका क्या । वे तो बॉस हैं । बरसात आ गई है । बाहर झमा झम पानी बरस रहा है और धर्म पत्नी का आग्रह है कि आज ऑफिस मत जाइए । पहली बरसात है, इसका आनंद लेना चाहिए। कहीं घूमने चलते है । मौसम बड़ा ही सुहाना है, यानि की बेईमान है । प्लाजा में भोजपुरी फिल्म लगी है और पड़ोस वाले पांडे-पंडाईन उसकी बड़ी तारीफ कर रहे थे ।'
एक बार तो मुझे अपने श्री बॉस का श्रीमुख याद आया फिर याद आया कि आज तो संडे है । आज के दिन अगर मैं आफिस न भी गया तो कोई पहाड़ नहीं टूट पड़ेगा । और फिर याद आयी मेरी सेकेंड हैंड साईकिल जिसका कुत्ता पिछले दो सप्ताह से फेल हैं और दोनो ब्रेक टकराने के बाद ही 'आज कल' लग रहे हैं । उनको दुरुस्त करवाने का सुनहरा अवसर इतवार होता है । इसलिए फिल्म कैंसिल क्योंकि धर्म पत्नी जिस कैरियर पर बैठेंगी उसका भी नट बोल्ट गिर गया है । 'फिल्म न सही तो फिर बेसन ही ले आओ । बरसात में गरमा गरम पकौड़ों का अपना ही आनंद है । प्याज, अदरक, हरी मिर्च वगैरह घर में हैं ही ।' इतना कह कर उन्होंने झोला और छाता पकड़ा दिया । हम बरसात का आनंद लेते हुये पइयाँ - पइयाँ पँसारी की दुकान पर पहुँचे । उसे घुनरहित बेसन का ऑर्डर दिया, लिफाफे में पाव भर बेसन लिया और जनता पान भंडार की तरफ बढ़ लिए । इतनी देर में हमे यह पता चल चुका था कि हमारा छाता भी रिपेयरिंग माँग रहा है क्योंकि हमारी बुशर्ट पीछे से गीली हो चुकी थी । | | पान खाकर, एक हाथ में झोला, झोले में बेसन और दूसरे हाथ में छाता लेकर हम घर की तरफ बढ़े । बुशर्ट पीछे से पूरी तरह भीग चुकी थी और जीभ भी जरा सी कट चुकी थी क्योंकि जनता पान भंडार वाले ने चूने का प्रयोग इफरात से किया था । |
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जनता पान भंडार वाले से हमारा पुराना याराना है इसलिए वो हमको देखते ही जर्दे वाला पान बनाना शुरू कर देता है और उसका हिसाब अपने रजिस्टर में हमारे नाम के आगे चढ़ा देता है । क्योंकि हमारा आग्रह सदा से यही रहा है कि भइया अपने पान का हिसाब तुम महीने-महीने कर लिया करो । ये रोज रोज की अठन्नी चवन्नी हमसे नहीं दी जाएगी ।
पान खाकर, एक हाथ में झोला, झोले में बेसन और दूसरे हाथ में छाता लेकर हम घर की तरफ बढ़े । बुशर्ट पीछे से पूरी तरह भीग चुकी थी और जीभ भी जरा सी कट चुकी थी क्योंकि जनता पान भंडार वाले ने चूने का प्रयोग इफरात से किया था । अपनी किस्मत को कोसते हम घर की तरफ लपके जा रहे थे कि तभी पीछे से पांडे जी की आवाज सुनाई दी ।
पलट कर देखा तो वो भी एक हाथ में छाता और दूसरे हाथ में ब्रेड लिये चले आ रहे थे । हमने इस बरसात में निकलने का कारण पूछा तो उन्होंने भी वही पत्नी परायणता का नारा बुलंद किया जिसके मारे हम भी टूटे छाते में भीगते फिर रहे थे ।
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