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कनॉट प्लेस में मंगेतर
अँगरेजी की रँगरेजी
- राजकुमार गौतम
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सबको पता है कि दिल्ली देश का दिल है। दिल्लीवालों को पता है कि दिल्ली का दिल कनॉट प्लेस है। दिल्ली के इस दिल उर्फ कनॉट प्लेस में ही इस कथा के दो धड़कते, जवान और मंगेतर दिल आज मिलने वाले हैं। यह उन्हीं दोनों की एक कथा है।

वर के पिता की ओर से संदेशा गया था कि बहू की जो साड़ियाँ खरीदी जानी हैं, उन्हें क्यों न लड़का-लड़की ही मिलकर खरीद लें। 'रीगल के गेट पर अपराह्न 4 बजे तक आप लड़की को भेज दें, मैं लड़के को पैसे देकर भेज दूँगा। बच्चे साथ-साथ घूम भी लेंगे और खरीदारी भी कर लेंगे।' वर के पिता ने कहा था और कन्या के पिता सहर्ष तैयार हो गए थे।

लड़का यूँ तो कुछ संजीदा किस्म का था मगर कभी-कभार वह भयंकर रोमांटिक भी हो उठता था। उसके व्यक्तित्व में ऐसा दोहरापन उसकी कॉलेज की शिक्षा के दिनों में ही पैदा हुआ था।
  सबको पता है कि दिल्ली देश का दिल है। दिल्लीवालों को पता है कि दिल्ली का दिल कनॉट प्लेस है। दिल्ली के इस दिल उर्फ कनॉट प्लेस में ही इस कथा के दो धड़कते, जवान और मंगेतर दिल आज मिलने वाले हैं। यह उन्हीं दोनों की एक कथा है।      


एक सहपाठिन को रिझाने की गरज से वह देर-देर तक लाइब्रेरी में बैठकर पुस्तकें चाटता रहता था। पुस्तकें, जिनमें दुनिया-जहान की बातें थीं। देश की गरीबी, भुखमरी बदहाली की दास्तानें थीं और इन सबके खिलाफ लड़ता कोई नायक या युगपुरुष होता था। पुस्तक का पहला अध्याय समाप्त होने न होने तक लड़का स्वयं को नायक में तब्दील कर लेता और फिर तो मानो वह उस पुस्तक रूप में अपनी ही भावी जीवनी पढ़ता। ठीक इसी तर्ज पर वह किशोर-प्रेम के कथा-किस्से भी पढ़ता और उनका भी वह नायक हो उठता। बहरहाल, ऊपरवाले की असीम कृपा से जब लड़का एक दफ्तर में क्लर्क हो गया तो उसने सोचा ‍कि प्रोबेशन क्लियर होते ही वह यूनियन में भी भाग लेने लगेगा वगैरह।

पिता ने जब पाँच हजार के नोट उसे यह कहते हुए थमाए कि कल अपराह्न 4 बजे रीगल पहुँच जाना और वहाँ पहुँची ज्योति को साथ लेकर 6-7 साडि़याँ खरीदवा लेना, तो लड़के पर तुरंत वही दोहरापन तारी हो गया। उसे पता था कि पिताजी ने फंड में यह पैसा जोड़ने की खातिर ही माँ को अच्छी साड़ी पहनने से जिंदगी-भर रोके रखा है और अब झूठी शान के चक्कर में वे यह सब कर रहे हैं।

साथ ही उसके कानों में वह आनंददायी संगीत भी गूँज उठा जो अब तक की देखी गई सैकड़ों फिल्मों में उसने उस समय सुना था जबकि नायक-नायिका की शादी के लिए माँ-बाप की 'हाँ' हो उठती है और वे एक गीत पर सवारी गाँठते हुए स्वप्न या साकार में खूबसूरत बागों और फव्वारों के बीच जा पहुँचते हैं या पहाड़ों पर दौड़ते फिरते हैं।

उस दिन बस पकड़ने के समय तक लड़का नाना प्रकार की तैय‍ारियों में ही व्यस्त रहा। अपने पर सबसे अधिक फबने वाला जोड़ा उसने पहना, शेव नाई से कराई, बाल सेट कराए और आत्ममुग्धता की स्थिति में तब तक कुर्सी पर बैठा शीशे को निहारता ही रहा जब तक कि नाई ने उससे यह नहीं पूछ लिया कि 'सुरमा लगा दूँ?' 'नहीं!' लड़के ने घबराकर जवाब दिया और फिर रीगल के लिए उसने बस पकड़ ली।
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