मुख्य पृष्ठ > विविध > साहित्य > व्यंग्य
सुझाव/प्रतिक्रियामित्र को भेजियेयह पेज प्रिंट करें
 
मूर्खता में ही होशियारी है!
1 अप्रैल : मूर्ख दिवस पर विशेष
- ज्ञान चतुर्वेद
ND
मूर्खता बहुत चिंतन नहीं माँगती। थोड़ा-सा कर लो, यही बहुत है। न भी करो तो चलता है। तो फिर मैं क्यों कर रहा हूँ? यूँ ही मूर्खतावश तो करने नहीं बैठ गया? नहीं साहब। हमसे बाकायदा कहा गया है कि करके दीजिए। इसीलिए कर रहे हैं। संपादक ने तो यहाँ तक कहा कि यह काम आपसे बेहतर कोई नहीं कर सकता और मूर्खता की बात चलते ही सबसे पहले आपका ही ख्याल आया था

शायद ऐसा उन्होंने मेरी फोटो देखकर कहा हो। कुछ ऐसी मूर्खतापूर्ण कशिश है मेरे चेहरे में कि आप किसी भी कोण से फोटो खींच लें, चीज छुपती नहीं। मूर्ख लगने, न लगने के बीच का एक संदेहास्पद क्षण हमेशा के लिए ठहर गया है चेहरे पर। सो लगता तो हूँ। पर आप जान लें कि ऐसा हूँ नहीं। फोटो तो हमेशा धोखा देते हैं। कुछ जो हैं, बल्कि खासे हैं बज्र टाइप हैं, वे फोटो में ऐसे नजर नहीं आते

कई बार तो खासे होशियार नजर आते हैं। कुछ मूर्ख तो समझदारीवश कुछ इस धज में फोटो खिंचवाते हैं कि होशियारी का भ्रम खड़ा हो जाए। ठुड्डी पर हाथ रखकर मुँदी-सी आँखें रखे। चिंतन में मग्न, बगल में चार किताबें धर के या किताबों की रैक के बगल में खड़े होकर, या चेहरे पर आधी रोशनी, आधी छाया डालकर यदि फोटो खिंचता हो तो आदमी बिना किसी और कारण के ही बुद्धिमान नजर आने लगता है

चिंतन में पहला पेंच यही आता है कि मूर्ख किसे कहें? परिभाषा क्या है? मूर्खता नापने का कोई यंत्र होता नहीं। इसकी नपती का फीता भी उपलब्ध नहीं। बस, अंदाज से पता करना होता है। मूर्खता हो सामने तो अंदाज-सा होने लगता है। फिर थोड़ी देर बात करो तो वह प्रकट भी हो जाती है

परंतु कई बार बातों से भी कुछ पता नहीं चल पाता। कठिन होता है, क्योंकि कई मूर्ख भी रटी-रटाई बुद्धिमत्तापूर्ण बातें करते हैं। साहित्य तथा चिंतन में तो हम नित्य ही इस दुनिया से गुजरा करते हैं कि भाषा की आड़ से मूर्खता बोल रही है या विद्वता? इसे समझना आवश्यक है कि मूर्ख इतना भी मूर्ख नहीं होता है कि सीधे-सीधे पकड़ में आ जाए। मूर्ख हमेशा मूर्ख ही नहीं होता। वह विद्वान तक हो सकता है।

मूर्ख टाइप के भी विद्वान होते ही हैं या कहें कि विद्वान टाइप के मूर्ख। पर ऐसे मूर्ख तब ज्यादा खतरनाक मूर्ख साबित होते हैं और उनसे बचकर निकलने में ही होशियारी कहाती है। ऐसे मूर्ख-विद्वान या विद्वत-मूर्ख किसी ऊँची कुर्सी पर बिराजे भी मिल सकते हैं। अब यह मत पूछिएगा कि मूर्ख होते हुए भी वह ऊँची कुर्सी पर कैसे पहुँचा

आपके मूर्खतापूर्ण प्रश्न का उत्तर यही है कि एक तो मूर्खता की वजह से ही उसे यहाँ बिठाया जाता है। फिर कई की मूर्खता कुर्सी पर बैठने पर ही प्रकट होती है। बैठने से पहले ठीक-ठाक लगते थे। बल्कि थेही। कुर्सी की अपनी मूर्खताएँ होती हैं। उस पर मूर्ख भी बैठ जाते हैं।

फिर कुर्सी के लिए चालाकी की आवश्यकता होती है, होशियारी की नहीं और मूर्ख होने का मतलब यह कतई नहीं कि मूर्ख आदमी चालाक नहीं हो सकता। वह चालाक किस्म का मूर्ख हो सकता है, सो चालाकी से कुर्सी हथिया ले और मूर्खता के कारण कुर्सी पर सफल भी हो जाए। यह बात अवश्य है कि मूर्खता बहुत समय तक छिपकर नहीं रह पाती।
1 | 2  >>  
और भी
राजकवि अकिंचनजी
नर्मदा मैया के तट पर
अष्टावक्र की डायरी
हम सब फेरी वाले !
सस्पेंशन का सौभाग्य
कार पर सवार सरकार