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एक शहर हुआ करता था
लघुकथा
डॉ. एस के त्याग
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इस नगरी में अब कोई नहीं रहता-न कोई मानुस, न चौपाया और न ही परिंदा। सड़कें हैं पर वीरान हैं, फैक्टरियों के हमेशा घूमने वाले चक्के पूरी तरह जाम हैं। हाट बाजार अब यहाँ किसी रोज नहीं सजते और न ही कहीं नुमाइशें या मेले ही भरते हैं।

स्कूलों और कॉलेजों के प्रांगण अर्से से सूने हैं, मंदिरों में भजन और मस्जिदों में अजान की गूँज कब की गुम हो चुकी हैं। हर तरफ एक मुर्दनी सी छाई हुई है। सुनते हैं, जब यहाँ पानी था तो एक शहर हुआ करता था।
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