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अतीत के आईने में पिता
ऐतिहासिक कथाओं में पिता के रूप
होशंग घ्यारा
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जब शाक्य सम्राट शुद्धोधन ने बढ़ती आयु और गिरते स्वास्थ्य को देखते हुए मृत्यु को आसन्न पाया, तो अपने पुत्र को एक बार देखने की इच्छा प्रकट की। वह पुत्र, जो वर्षों पूर्व उनका वैभवपूर्ण राजमहल छोड़कर वन की ओर चला गया था। जो अपनी धर्मपत्नी और शिशु के निद्रावस्था में रहते उनसे अंतिम विदा ले गया था ताकि वह अपने अंतस को जागृत कर सच का साक्षात्कार कर सके। दुनिया के लिए अब वह बुद्ध हो गया था किंतु पिता को अब भी अपने सिद्धार्थ का मुख देखने की लालसा थी, उसकी वाणी सुनने की कामना थी।

बुद्ध ने वृद्ध सम्राट का संदेश मिलने पर कपिलवस्तु जाने का निर्णय किया। दूर से चले आ रहे पुत्र को देख शुद्धोधन का हृदय खुशी से झूम उठा। मन में वात्सल्य की तरंगें उमड़ पड़ीं ... और बोधित्व प्राप्त महापुरुष के दर्शन कर मन श्रद्धा से भर गया। वात्सल्य और श्रद्धा के बीच पिता का मन एक अजीब-से अंतर्द्वंद्व के तूफान में घिरा था। जब बुद्ध ने सम्राट के समक्ष आसन ग्रहण किया, तो एक बारगी सम्राट के मन में इच्छा उठी कि वे कह दें,' सिद्धार्थ, पुत्र, अपने पिता के पास वापस आ जाओ!'

किंतु वे जानते थे कि यह असंभव है। जिस पुत्र को उन्होंने कभी उँगली पकड़कर चलना सिखाया था, वह अब संसार को सत्य के मार्ग पर चलने का ज्ञान देने निकल पड़ा था। अब वह कभी उनका पुत्र, उनका सिद्धार्थ नहीं हो सकता था। अब वह केवल उनका गुरु हो सकता था।

जब पुत्र का जन्म हुआ था, तब ज्ञानियों ने भविष्यवाणी कर दी थी कि बालक या तो चक्रवर्ती सम्राट बनेगा या फिर महान साधु। एक पिता के नाते शुद्धोधन ने यही चाहा कि उनका पुत्र उनके साँचे में ढले, उनके बाद उनका राजपाट संभाले और राज्य का विस्तार कर चक्रवर्ती सम्राट बने।

संसार त्यागने की बात कभी उसके मन में न आए, इसके लिए उन्होंने व्यापक प्रबंध किए, उसे हर प्रकार के दुख, पीड़ा के दृश्य से दूर रखा लेकिन सिद्धार्थ के भाग्य में जो लिखा था वह होकर रहा। उसने एक वृद्ध, एक रोगी, एक शव तथा एक साधु को देखा और निकल पड़ा सत्य का मार्ग तलाशने। आज वही बुद्ध के रूप में सामने था और जो पिता कभी उसे वैभवशाली सम्राट के रूप में देखना चाहते थे, वे उससे दीक्षा लेने को तत्पर थे..!
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