इस दौर में किशोरियाँ सामने वाले से बहुत जल्द प्रभावित हो जाती हैं। खासकर विपरीत सेक्स से, चाहे वो व्यक्ति किसी भी उम्र का क्यों न हो, सामने वाले की किसी एक अदा पर इस तरह मर मिटेंगी कि उसके बाकी गुण-अवगुण कुछ भी उसे नजर नहीं आएँगे। यही समय उसकी परीक्षा की घड़ी होती है, जब कोई उसे बहला-फुसलाकर गलत राह पर ले जा सकता है। माँ, बड़ी बहन या भाभी की बात या समझाइश उसे कुनैन की तरह कड़वी लगेगी। उसका भला चाहने वालों को वो दुश्मन समझेगी।
यह समय इन अल्हड़ बालाओं की माँ के लिए कठिन दौर और अग्नि परीक्षा से कम नहीं होता। अगर माँ सख्ती करती है, तो इन लड़कियों का गलत कदम उठाने का डर रहता है। उस पर चौकसी या निगरानी भी इस तरह करनी पड़ती है कि वो भाँप न जाए कि उस पर नजर रखी जा रही है।
दूसरी तरफ इनका दिल न टूटे, इसका भी ख्याल रखना पड़ता है, क्योंकि इस उम्र में हर तरह की भावनाओं का बड़ी जल्दी प्रभाव होता है। जिस तरह वे रंगीन दुनिया और खुशनुमा सपने में एकदम खोकर एकसार हो जाती हैं, उस तरह उनके दिल को कब चोट पहुँच जाए, कहा नहीं जा सकता। ‘इंपल्सिव नेचर’ इस उम्र की खासियत होती है, जिसमें परिपक्वता और गंभीर सोच की कमी रहती है। इसलिए इस उम्र की लड़कियाँ जरा-जरा सी बात पर आत्महत्या जैसे कदम उठा लेती हैं।
कक्षा में फेल होना, अपनी पसंद की फिल्म देखने को न मिलना, अपनी खास सहेली के दु:ख से द्रवित होना, किसी बच्चे के दु:ख या बीमारी से या किसी पशु-पक्षी के दु:ख से कातर होना और इन हादसों को जीवन-मृत्यु का आधार बनाकर भीषण कृत्य कर, इस मनोस्थिति में इन्हें कुछ समझाना या रोकना बहुत कठिन होता है। इससे निपटने के लिए बहुत सूझबूझ से काम लेना पड़ता है, जरा-सी भी चूक से इनके भटकने का अंदेशा बढ़ ही जाता है।
वैसे तो उम्र के तेरहवें सोपान से उन्नीसवें तक किशोर वय माना जाता रहा है और माना जाता है कि महानगरों की किशोरियाँ शारीरिक ही नहीं मानसिक रूप से ज्यादा परिपक्व हो जाती हैं। बाहरी दुनिया से जल्दी, लगातार और अधिक संपर्क होने से यथार्थ के धरातल का आभास शीघ्र हो जाता है। वैसे अठारह वर्ष में उसे वयस्क मान लिया जाता है, तो एकदम नासमझ तो होने का सवाल ही नहीं है। एक तरह से जीवन की जटिलता ने इन किशोरियों को समय से पहले वयस्क, परिपक्व और समझदार बना दिया है।
अन्य नगरों और प्रदेशों की राजधानी व प्रदेश के नगरों में भी पत्रिकाओं, फिल्मों ने इन किशोरियों को पहले की तरह एकदम भोली और नासमझ तो रहने नहीं दिया, पर इन पर अनुशासन और मर्यादा की बंदिश का जोर अभी भी है। बड़ों के सामने अपनी इच्छा को दबाने या खुलकर न बोलने का जज्बा अभी जीवित है। इच्छाओं का दमन करना या बड़ों के सामने नकली आदर के रूप में अपने आपको भोला और नासमझ बताने या दिखाने का सिलसिला जब तक जारी रहेगा, तब तक इस उम्र के सपनों का सतरंगा इंद्रधनुष फीका नहीं पड़ेगा।
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