इनके दोस्त... दोस्त। और माँ-बाप के दोस्त कूड़ा-करकट। उनसे रहा न गया। पुनः फोन लगाया अनुकृष्णा को। पूछें तो सही, तसल्ली से कि कब गई थी। कितनी देर बात की? क्या बात हुई? आखिरकार दोस्त है बचपन का।
देवकीनंदन ने स्नेह से सारी जिज्ञासाओं का समाधान कर दिया होगा। बिटिया प्रसन्ना हो गई होगी, सोचकर ही ममता से दिल भर आया उनका। सुदूर बैठी बिटिया पर नाहक ही झल्ला रही हैं वे। पूछें तो कारण, कि क्यों नहीं लिया उनका नाम...? यू तो बड़ा प्यार जताती है माँसे। फिर माँ का नाम लेने में संकोच क्यों? पूछें तो... क्या हुआ वह दावा कि- मेरी माँ दुनिया की सर्वश्रेष्ठ माँ है। और वहाँ जिक्र तक नहीं किया।
पुनः उपेक्षा उनकी। बिजली-सी कौंध गई उनके दिल में। पापा ने उपेक्षा की थी, वे कुछ न बोली थीं। न तर्क, न विवाद। कुट्टी कर ली थी उन्होंने पापा से। न सुलह, न समझौता...। पूरा जीवन गुजार दिया गूँगी-बहरी बनकर।
मगर अब दोबारा वही गलती नहीं करेंगी वे। वे बिटिया से कभी भी कुट्टी करने की गलती हरगिज नहीं करेंगी। वे अपने और बिटिया के बीच तथाकथित जनरेशन गैप को नहीं आने देंगी। आपस में बोल-बतियाकर वह इस गुत्थी को सुलझाने की कोशिश करेंगी। स्वामी श्री तरुणसागर जी कहते हैं- 'आपस में लड़ो-झगड़ो, फिर भी परस्पर बोलचाल बंद मत करो।' सिम्पल लेकिन बड़ी बात... कुट्टी मत करो।
इसीलिए उन्होंने बिटिया से स्पष्ट प्रश्न किया- 'तूने क्यों नहीं बताया... कि तू मेरी बेटी है? आखिर हम मित्र रहे हैं बरसों।'
-'माँ... माँ... माँ आप जाने किस सदी की मित्रता की बात कर रही हैं। आज मित्रता नहीं, मनी है महत्वपूर्ण। मैंने बाकायदा फीस जमा करके अपॉइंटमेंट लिया था। नंबर आने पर ही काउंसलिंग के लिए गई थी। मगर आपका आदेश था, सिर्फ इसलिए अपने परिचय के साथ सुदीप अंकल का जिक्र किया, तो अय्यर अंकल तो एकदम सतर्क हो गए। सबसे पहले उन्होंने यह कन्फर्म किया, कि मैंने फीस जमा करके ही उनके सेक्रेटरी से अप्वाइंटमेंट लिया है न।
सुदीप अंकल का नाम सुनकर प्रसन्न होना, हालचाल पूछना तो बहुत दूर की बात है। माँ, वहाँ सिर्फ प्रोफेशनल करियर काउंसलर था मेरे सामने। आप दोनों का मित्र मुझे कहीं नजर आया ही नहीं।'
बस... इसीलिए मैंने नहीं बताया कि मैं आपकी बेटी हूँ। मैं तो शर्मिंदा हूँ... यह सोचकर कि मैंने सुदीप अंकल का नाम भी क्यों लिया?
माँ, जो सच था मैंने आपसे कह दिया। अब तो नाराज नहीं हैं न आप मुझसे? 'माँ मुझसे कुट्टी मत करना प्लीज।' बिटिया की विनती सुन लरज गईं वे- 'पागल, मैं... तुझसे कुट्टी करूँगी?' बात न की होती, तो अनर्थ हो जाता आज। दर्द से दिल भर आया उनका। हो सकता है पापा और उनके मध्य भी गलतफहमी ही हो। यह विचार आते ही, आज... आज पहली बार उनका मन हो रहा है... पापा से मिट्ठी करने का।
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