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कुट्टी
बड़े-बुजुर्गों की हर बात से उन्हें चिढ़ होने लगी। दिन-ब-दिन वे मूक और कृपण होती गईं। अपने में ही व्यस्त, कि सबसे दूर हो गईं। पिता की परोपकारी प्रवृत्ति एवं माँ की सेवाभावी विनम्रता से एकदम उलट। आत्मकेंद्रित एवं स्पष्टवादी।

मन पर लगी ठेस कभी भी जख्म बनकर पकती, फूटती, सूखती नहीं है। बल्कि एक गाँठ बन जाती है। बचपन की उपेक्षा उनके अंदर गाँठ बनकर उभरी और उसी ग्रंथि ने उन्हें अपनी बिटिया के प्रति बेहद संवेदनशील बना डाला।

नामकरण संस्कार के समय सब बोले- 'काली है, काजल नाम रख दो।' उन्होंने सिरे से सुझाए गए सारे नामों को खारिज कर संयत स्वर में कहा था- 'पंडितजी, मेरी बिटिया में जबर्दस्त आकर्षण है। इसे नाम दीजिए- अनुकृष्णा।'

उसके बाद कभी किसी रिश्तेदार की हिम्मत नहीं हुई अनुकृष्णा को काला कहने की। बस एक ही ध्येय, वे पापा को दिखा देना चाहती थीं कि अपने बच्चों की फिक्र कैसे रखी जाती है। उनकी सुविधाओं में गैरों की हिस्सेदारी जायज नहीं है। बच्चों के भविष्य की संकल्पना माँ-बाप की जिम्मेदारी है

उन्हें ऐसा लगता है, पापा को उनकी मनोभावना का संज्ञान हो चुका है। तभी तो गले लगाकर यही कहते हैं- 'मेरी पगली बिटिया, हमेशा जीतती रह।' सब पूछते हैं, 'ऐसा क्यों कहते हो?' वे कभी नहीं पूछतीं। उन्हें तो जीतकर दिखाना है।

किंतु आज... आज लग रहा है हार गईं वे। पापा से भी और अपनी बिटिया से भी। हूक-सी उठी मन में। उनकी परवरिश में कसर कहाँ रह गई? अनुकृष्णा को लेकर उनका मन बड़ा जिद्दी। उनके मुताबिक रेस में हिस्सो लेने वाले कभी आराम नहीं करते और इसने अच्छा-खासा मौका गँवा दिया। ठीक से कुछ पूछा नहीं। यह तो संयोग ही था, कि उस दिन अचानक ही वे अपनी दुविधा सुदीप को बता बैठी थीं- 'देखते ही देखते तीन साल निकल गए। अब आगे क्या एमबीए करे या एम. फार्मा कन्फ्यूज्ड है अनुकृष्णा।'

सुनते ही उछल पड़ा था सुदीप, बिलकुल बचपन की तरह- 'हद करती हो यार... तुम्हें नहीं पता अपना देवकीनंदन भी बंगलोर में ही तो है। डॉ. देवकीनंदन अय्यर- करियर काउंसलर। बस, बोल दो बिटिया से... सारे कन्फ्यूजन रख दे उसका सामने जाकर। बिटिया से कहो, मेरा नाम ले, जाकर। कहे कि संदीप अंकल ने भेजा है। तुम्हारा नाम ले, जाकर... बताए कि वह तुम्हारी बेटी है। बरसों बाद हमारी खबर पाकर खुशी से नाचने लगेगा, आखिर बचपन का दोस्त है अपना।'

उन्होंने भी तुरंत अनुकृष्णा को फोन कर दिया कि वह जल्दी ही अय्यर अंकल से इस लाइन के स्कोप की जानकारी ले ले। घबराना मत, बचपन के दोस्त हैं वे। निश्चिंत हो गई थीं। मानो किला फतह कर लिया हो।

बचपन का दोस्त, तमाम भूली-बिसरी यादें ताजा हो गईं। उनसे रहा नहीं गया। ये आजकल के बच्चे अपने ही मन की करेंगे। माता-पिता का मन रखने को भी नहीं मानते कोई बात। बस, इनके मन का हो... जो भी हो।
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