किसी का कुछ नहीं गया, पर उनकी माँ चली गईं। माँ दुनिया से भले चली गईं, पर उनके मन में आज भी जिंदा हैं। और जिंदा है 'रिश्तेदार' शब्द से नफरत। इस नफरत को पुख्ता किया था पापा की परोपकारी प्रवृत्ति ने। ऊँचे ओहदे पर होने से पापा की पहुँच भी ऊपर तक थी। उसी का फायदा लेने उस रोज विलास आ गया था- 'अंकल, बस इस एक पेपर की वजह से मेरा पूरा रिजल्ट बिगड़ जाएगा। सक्सेना सर के पास गई है कॉपी। प्लीज उनसे बात कीजिए।'
फाइनल ईयर उनका भी था। पापा अगर विलास की सिफारिश कर सकते हैं तो वे सगी बिटिया हैं...। यही सोच उन्होंने भी धीरे से अपनी अर्जी रख दी थी- 'पापा, मैं भी दे दूँ मेरा रोल नंबर...?'
- 'हिश्ट्... बेटा तुझे क्या जरूरत है? तू तो वैसे ही मेरिट होल्डर है। न भी होती, तो भी कहीं अपने बच्चे की सिफारिश करना शोभा देता है?'
अवाक् रह गई थीं वे। पापा की परोपकारिता का सिलसिला थमा कहाँ था?
हद हो गई उस दिन, जब पापा ज्योतिषी के पास दीदी के विवाह हेतु किसी युवक की कुंडली मिलवाने गए थे और वहीं आ गए थे उनके एक मित्र। वे भी सजातीय और सयानी बिटिया के विवाह की चिंता से ग्रस्त। पापा उन्हें परेशान कैसे देखते।
तुरंत कुंडली उन्हें थमा दी- 'नंदिनी की जन्मपत्री से मिलवाने के बजाए अब आपकी मीना की पत्रिका से मिलवाइए इसे। नंदिनी की अभी उम्र ही क्या है?'
इस प्रसंग का रहस्योद्घाटन तब हुआ, जब मीना की बारात द्वार पर आ चुकी थी। मीना के ससुर ने समधी भेंट में गले मिलते हुए जोरदार शब्दों में पापा को उलाहना देते हुए कहा था- 'अरे साहब, आना तो चाहते थे हम आपके द्वार, पर आपने भेज दिया अपने मित्र के द्वार पर।'
-'यह द्वार भी अपना ही है' पापा का स्वर गदगद था। किंतु वरमाला थामे दूल्हा-दुल्हन की आँखों में, क्षणभर को ही सही, हाहाकार मचा जरूर था।
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