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कुट्टी
वे छोटी थीं किंतु ये बातें उनके लिए छोटी नहीं थीं। वे देखती थीं, बड़े भाई-बहनों का पैर पटक-पटक रोना। खासतौर पर दिवाली के अवसर पर।

जब पापा दो-तीन झोले भरकर पटाखे खरीदकर लाते थे, भैयाओं की खुशी देखते ही बनती थी। हर दिवाली पर भैयाओं के लिए लेटेस्ट तमंचे-बंदूकें भी आती थीं। भैया उन्हें दिखाकर, डरा-डराकर खूब हँसते थे।

मगर उनकी हँसी, उधम-मस्ती अगले ही पल रोने-ठिनकने में बदल जाती थी, ज्यों ही पापा पटाखों के हिस्से करना शुरू करते थे। दो बड़ी-बड़ी परातों में अनार, चकरी, रॉकेट, सूतली बम, लक्ष्मी बम, रंगीन माचिस यहाँ तक कि साँप ओर टिकली के पूड़ों तक का बँटवारा। आधे पटाखे भैयाओं को और आधे आंटी के बच्चों को देने पापा, भैयाओं को रोता छोड़ निकल जाते थे।

भैयाओं के गालों पर बहते आँसू और माँ की चुप्पी में छुपी पीड़ा उन्हें तकलीफ देती थी। कुछ देर बाद दोनों भैया जितने पटाखे मिलते थे, उन्हीं से संतुष्ट हो धूम मचाने लगते थे। पर वे मुस्कुरा नहीं पाती थीं। शायद यही वजह हो कि आज भी उन्हें दिवाली का त्योहार उल्लास-उत्साह के बजाय उदासी ही देता है।

उनका मन तार-तार हो जाता है उन यादों से। सच तो यह है, कि उनकी मुस्कुराहट बहुत बचपन में ही छिन गई थी। जब उन्होंने माँ-पापा को जाने कितने संघर्ष-संधि-समझौते करते देखा था। नाते-रिश्तेदारों के लिए तन-मन-धन से न्योछावर, भले ही जेब में पूँजी हो न हो। पापा का नाम ही काफी था। दुकानदारों को भी पता था, पैसा तो डूबने वाला है नहीं। अतः सूखे मेवों से लेकर मुरमुरे तक सेर-सेर भर से कम न भेजते थे। खाने-पीने के घर में भरपूर भंडार। उसी अनुपात में घर में डेरा डाले खाने वालों की भी भीड़ भरपूर।

उनका घर, घर से ज्यादा धर्मशाला थी। उन्हें याद नहीं कि घर में सिर्फ माँ-पापा और वे भाई-बहन रहे हों। बुआ के बच्चे, मौसी के बच्चे तो एक-दो सदा ही बने रहते। इसके अलावा संयोग से घर भी बहुत बड़ा था, कि रिश्तेदारों के घर आए मेहमानों को भी सुविधा होनेकी वजह से, रात को सोने उन्हीं के घर भेज दिया जाता था।

सोना तो एक बहाना होता था। पूरे सोलह श्रृंगार उन्हीं के घर होते थे। पूरी आवभगत माँ के जिम्मे। बच्चों के हिस्से में माँ आ ही नहीं पाती थीं। रसोई घर... रिश्तेदारों... रस्मो-रिवाजों में हर क्षण व्यस्त। सब कुछ लुटाते रहने के बावजूद मिला क्या? सबको आराम देने के चक्कर में, खुद थककर ऐसी सोईं, कि सोती रह गईं।
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