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बाईनामा

श्रीमती वर्मा ने कहा। और ये छोटे झोपड़पट्टी में रहने वाले लोग कितने कामचोर और निकम्मे हैं। इस विषय पर बोलते, सफाई और प्रदूषण के पाठ इनको किस तरह पढ़ाए जाने चाहिए, इस पर सोचते, झोपड़ियों के हटने पर क्या नुकसान होगा, इस पर बतियाते वे लोग एक बड़े से महात्मा गाँधी पार्क में पहुँच गईं।

यहाँ उन्हीं की तरह और भी ढेर सारी महिलाएँ हैं। आधे पार्क पर पुरुषों का कब्जा है। कोई व्यायाम कर रहा है, कोई आराम। कोई बगीचे में टहल रहा है। अब सब यहाँ हास्य क्लब चलाएँगे। चारों ओर से ठहाकों, तालियों, हा हा, हू हू की आवाजें आने लगीं हैं। करीब एक, डेढ़ घंटे बाद सब लौट जाएँगे।

***

उधर झोपड़पट्टियों में कहीं पानी भरना, लड़ना, कपड़े धोना, खाना बनाना चल रहा है। 'कुछ' बच्चे स्कूल जाने की तैयारी में हैं, 'ज्यादातर' काम पर जाने की जल्दी में हैं। कहीं लाइन में खड़े होकर एक-दूसरे पर 'देर' करने का आरोप-प्रत्यारोप करते लोग अपनी झल्लाहट एक-दूसरे पर निकाल रहे हैं। कोई घर में ही गाली-गलौज, मारपीट पर उतर आया है

कुछ को कलाली खुलने का बेचैनी से इंतजार है। धुएँ के बादल से बन रहे हैं। चारों ओर शोर है और उस पर टेपरिकार्डर का भी जोर है। शोर-शराबा, चहल-पहल देखते लगता ही नहीं कि ये अलसुबह है। माया का पति टूटे दरवाजे पर झोपड़ी के सामने उकडूँ बैठा, मंजन कर रहा है। सामने लगे टाट, पैबंद के पुराने कपड़ों आदि से बने बाथरूम में 'कासी', माया की बेटी, नहा रही है

माया की झोपड़ी से मेनरोड पर घूमने जाने वाले दिखाई दे रहे हैं। कुल्ला करते-करते माया का पति चिल्लाया- 'एऽऽऽ कासीऽऽ जल्दी से नहाकर निकल, वो आ गए देख सुबे-सुबे घूमने वाले। पता नहीं किसकी नजर कैसी हो।' वह बड़बड़ाया। इतने में माया पानी का पीपा भरकर उठा लाई- 'लोऽ अब तुम नहाते रहना।'

-'तू नहा ली?' पति ने पूछा।

-'मैं कब नहाऊँ! नल चले गए। अब 'हैंडपंप' से पानी लाना पड़ेगा। लंबी लाइन लगी है उधर। मेरे को देर हो जाएगी तो! अभी घर का काम पड़ा है और चार घर निबटाकर फिर जाऊँगी वो चौथी लाइन वाली मेमसाब के वहाँ...।'

-'ऐ! तू जरा कासी को जल्दी कर।' उसने चिल्लाकर कहा।

-'और कित्ती जल्दी करूँ बापू? जित्ती जल्दी करो, उससे भी जल्दी उठकर आ जाते हैं ये! मेरे को ठंड नईं लगती क्या।' कासी बड़बड़ाती हुई टाट उठाकर बाहर निकली और झोपड़ी में घुस गई।

-'हाँऽऽ! ये थोड़ी देर से उठें तो इनको क्या फर्क पड़ता है? हमको भी सुविधा हो जाएगी। सुबे-सुबे का टेंसन बेफालतू।' वो झल्लाया।

-'वैसे भी साफ-सफाई काम वगैरा तो हमको ही करना है।' माया ने भी जोड़ा। माया बातूनी है खड़ी हो गई वहीं, 'वो भी क्या करे! तबीयत उन लोगों का साथ नहीं देती। मेरी मेमसाऽऽब तोऽऽ बिचारी सकर की बीमारी से दुःखीऽऽऽ, उप्पर सेऽऽ बिच्चारी की साऽऽस...।'

-'चल चल- तू जल्दी कर। नहीं तो तेरी ये इच बिच्चारीऽऽ मेमसाब डाँटने में कसर नई रख्खेगी।' माया के पति ने बीच में ही उसकी बात काटकर कहा। वैसे भी उसे इन बड़े लोगों की तरफदारी करना जरा भी पसंद नहीं है, 'और अम्मा कब से आवाज दे रही है, सुनाई नईं देतातेरे कोऽऽ?'

-'हाँ! और पैसे देने के टाइम कितनी किचकिच करती हैं ये आंटी लोग।' कासी का बेटा न जाने कहाँ से आकर बीच में ही बोला। परसों ऊपर का माला साफ करवाने का पूछ रई थी एक आंटी। मैंने पच्चीस रुपए माँगे तो चिक-चिक करने लगी। वहींच पटककर आ गया काम। अब करें अपने आप।' कासी का बेटा शान से बोला।

-'मुएऽऽ उनका कुछ नई बिगड़ाऽऽ। चंपा का महेस पंद्रह रुपए में कर आया काम। पर अपना तो नुसकान हो गया ना? एक घर भी गया। लगा के रखने पड़ते हैं घर। आड़-अड़च्चन, ज्यादा-कम पैसे की जरूरत पड़ती है तो कहाँ से लाती हूँ मैं? ऐंऽऽ नासपीटा सान मारे खड़ा खड़ा।'माया उस पर बुरी तरह निकल ली।

झोपड़ी के पीछे से माया की सास बार-बार आवाजें लगा रही है। काम निपटाकर माया ने थोड़ा तेल, बालों में डाला। वही हाथ-पैरों पर भी मसल लिया। जल्दी से चोटी डाली, माँग भरी और माथे पर गोल बड़ी-सी बिंदी लगाई। एक नजर अपनी झोपड़ी के कमरे पर डाली। सोचा, चलो टीवी, फ्रिज तो है ही। इस बार कपड़े धोने की मशीन भी ले लूँगी किसी से। सोचकर माया खुश हो गई। मेमसाब की सास दो-चार महीने टिक गईं, तो इंतजाम हो ही जाएगा।
माया बाहर निकलने ही वाली थी, कि अम्मा की फिर आवाज आई- 'ऐ मायाऽऽ जरा-सा घुटनों परये तेल तो मसल दे।' और वो खुद हाथ पर चूना और तंबाकू मसलने लगी। खाट के पास नीचे बैठकर माया ने फटाफट दो-दो हाथ घुटनों पर चलाए, झटपट बोतल का ढक्कन बंद कर दिया।

-'ऐ। हैंऽऽ! जरा निरात से कर- इत्ती क्या जल्दी मचा रही है?' अम्मा नाराज हो गई।

-'अम्माऽऽ उधर मेमसाहब की सास आई है। अब उनसे तो कुछ बनेगा नईं। मेरे को ही करना है। पैसे भी मिलेंगे अलग से।' माया ने उठते हुए कहा।

-'ऐ लोग खुद क्यों नईं करते कुछ काम। मुए। सेहत भी सुधरी रहेगी। बड़े-बड़े पेट लेकर यू घूमना नईं पड़ेगा।
फालतू सुबे-सुबे, सबेरे-सबेरे हा हा, ही ही करते।' अम्मा बड़बड़ाने लगी। जाते-जाते चिल्लाकर बोली- 'ना ना अम्माऽऽ उनकी सेहत को कुछ मत कहना। उनके बड़े-बड़े पेटों से ही तो हमारे छोटे-छोटे पेट पलते हैं। भगवान उनकी तबीयत को नाजुक ही बनाए रख्खे।'

अम्मा लड़खड़ाती बाहर आई, मगर माया नहीं रुकी। उसे फुरसत कहाँ? और लो, आज तो फिर देर हो गई।
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