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बाईनामा
-'आजकल आठ-दस दिनों से मेरी सास आई हुई हैं। सुबह का समय मिल जाए वही बहुत है।' श्रीमती वर्मा ने दुखड़ा रोया।

-'अभी रहेंगी क्या?' विमलाजी की सहानुभूति।

-'हाँऽऽ महीना-दो महीना तो रहेंगी ही, फिर भाई साहब ले जाएँगे। देखो कब ले जाते हैं। देखिए ना, वो ओल्ड एज हैं और मेरी तबीयत ऐसी रहती है। अपने आप को संभालूँ कि उनकी तीमारदारी करूँ?' श्रीमती वर्मा कलपीं।

-'बाई क्यों नहीं रख लेतीं आप? पूरे समय की।' अचानक पीछे से आवाज आई, तो दोनों ही चौंककर पलटीं- 'अरे सरिता, तुम कब आईं?'

-'मैं तो कब से ही तुम लोगों के साथ आने की कोशिश कर रही हूँ, इसलिए बात सुन गई।' सरिता बोली। श्रीमती वर्मा और विमलाजी की नजरें आपस में टकराईं, अर्थपूर्ण ढंग से- 'बच गए। अच्छा हुआ, इसकी बुराई नहीं कर रहे थे।'

-'मेरी सास आई थी न! तब मैंने तो यही किया था। पूरे दिन की बाई रख ली थी। अपने से नहीं होता।' सरिता ने गर्व से कहा।

-'हाँऽऽ, और क्या! ऊपर से मिलने आने वाले! कितना काम बढ़ जाता है।'
-'मैंने तो सब कामों के लिए अलग-अलग बाई रखी है। झाडू-पोंछा, बरतन-कपड़े, खाना बनाने वालीऽऽ ऊपर की साफ-सफाईऽऽ, एक ने छुट्टी की कि दूसरी से करवा लेती हूँ। पर उन पर ध्यान भी खूब देना पड़ता है।' विमलाजी ने अपना स्टेटस दिखाया।

-'वैसे तो मैंने भी माया से कह दिया है, झाडू-पोंछा तू करती ही है तो सुबह शाम दो-दो घंटे रुककर अम्माजी का काम कर के जाया कर

मेरी दूसरी बाइयों को तो फुरसत ही नहीं है। माया को मगर रोज पन्द्रह मिनट, आधा घंटा देर न हो जाए, तो वो 'माया' ही क्या?' श्रीमती वर्मा ने कहा।

-'अरे खूऽऽब मिल जाती हैं इस झोपड़-पट्टी में। कोई और लगा लो!' सरिता ने लापरवाही से कहा।

-'रहती तो माया भी यहीं है। कह भी रही थी कि मैं आपको देखती हूँ रोज सुबह घूमने जाते हुए। पर मैं तो उधर देखती ही नहीं। पता नहीं कैसे लोग हैं। किसकी नजर कैसी है!' श्रीमती वर्मा ने अपना डर जताया।

-'वैसा माया आपके पास काफी समय से है न?' सरिता ने पूछा।

-'हाँ! पाँच साल पहले हम यहाँ नए आए थे और ये झोपड़ियाँ भी इतनी नहीं थीं। तब लगी थीं। हम तो दूर से आवाज देकर भी बुला लेते थे कई बार।' श्रीमती वर्मा ने कहा, 'अब तो जैसे-जैसे नई-नई कॉलोनियाँ और बंगले बन रहे हैं, झोपड़पट्टियाँ भी उसी तेजी से बढ़ रही हैं।'

-'पर ये लोग कितनी गंदगी में और कैसे तो रहते हैं?' सरिता बोली।

-'बताऊँ? मैंने तो माया के लिए अलग से साड़ी रख दी है। आते ही पहले कहती हूँ, तू कपड़े बदल बाबा।' श्रीमती वर्मा ने जोड़ा- 'पता नहीं, कब नहाते-धोते हैं।'

-'क्या नहाते होंगे! इतनी जल्दी काम पर आ जाते हैं। क्या साफ-सफाई से रहते होंगे! मुझे नहीं लगता। हमारे पड़ोस की नैना की तो सुबह ही साढ़े छः बजे बाई की घंटी से होती है। मैंने तो कितनी बार उनका छत वाला बाथरूम बाई को इस्तेमाल करते देखा है। मैंऽऽ नहीं लड़ियाती, फालतू। अपना काम करो और जाओ।' सरिता ने रौब झाड़ा।

-'वैसे तो डेढ़-दो हजार खर्चा करें तो महँगे नौकर भी मिल जाते हैं। फिर अपन कहें, तो हाथ-मोजे चढ़ाकर भी काम करें अपना।' श्रीमती वर्मा ने कहा।

-'मगर इतने महँगे नौकर, फिर उनके नखरे और माँगें भी महँगी! फिर हम कहाँ जाएँगे?' विमलाजी के बोलने पर सब हँसने लगीं।

-'नहीं अफोर्ड कर सकते। इतने पर घर का बजट गड़बड़ा जाएगा। इतने में तो 'ऐसे' चार रख लें।' सरिता ने कहा। -'फिर वे नौकर वैसा काम भी नहीं कर पाते, जो ये बाई वगैरा कर देते हैं।' श्रीमती वर्मा ने कहा।

-'पर आजकल तो कामवालियों के भाव भी चढ़ गए हैं। जरा-सा ज्यादा का काम बताया, कि मुँह देखो उनका! दस-पाँच का नोट दिखाओ, तो फिर खुश!' विमलाजी ने बताया।

-'हाँ, मैंने भी बाई के लड़के से लॉफ्ट साफ करवाया, ट्रंक उतरवाए। रद्दी निकलवाई। अपने से कहाँ होता है। फिर दिए बीस-पच्चीस रुपए।' सरिता बोली।

-'हमने तो ऊपर वाली टंकी साफ करने का बोल रखा है, बाई के हसबैंड को। मगर कल तो आया नहीं निकम्मा। अब आटा पिसवाने आएगा। उसी दिन करवा लूँगी, खड़े होकर। अब ये काम कोई घर के लोगों से होते हैं भला!'
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